जाति धर्म और लैंगिक मसले

      अध्याय 3 - जाति, धर्म और लैंगिक मसले
​श्रम का लैंगिक विभाजन : काम के बटवारे का वह तरिका जिसमे घर के सभी कार्य महिलाओ के द्वारा किए जाते है, जबकि पुरुष धन कमाने के लिए घर से बाहर के कार्य करता है, यह अवधारणा सामाजिक अपेक्षा व रूढ़िवादिता पर आधारित है।
इसमे महिलाए केवल घर कि चार दिवारी मे रहकर कार्य करती है। महिला के कार्यों से कोई आमदनी नहीं होती है। अतः उन्हें मुल्यवान नहीं माना जाता जबकि बाहर के कार्यों मे आय प्राप्त होती है। इसलिए पुरुषों के कार्यों को मुल्यवान माना जाता है। पहले राजनैतिक अधिकार केवल पुरुषों के पास ही थे। लेकिन धीरे-धीरे राजनीति में लैंगिक मुद्दों पर चर्चा हुई तथा महिलाओ ने राजनीतिक अधिकारों के लिए आन्दोलन किए जिससे उन्हे शिक्षा, रोजगार एवं मतदान के लिए आगे लाया गया। महिलाओं के द्वारा किए गए आन्दोलनो को नारीवाद कहा जाता है। इन आन्दोलनो के कारण महिलाओ के जिवन में सुधार आया अनेक महिलाए डाक्टर, शिक्षक, इंजिनीयर आदि के कार्यों मे शामिल हुई।
© ​भारत एक पुरुष प्रधान देश है। जिसमे आजादी के बाद महिलाओ कि स्थिती में सुधार तो हुआ है, लेकिन फिर भी महिलाओ के साथ भेद-भाव किया जाता है। भारत में महिला साक्षरता 54% एंव पुरुष साक्षरता 76% है। विद्यालय परिक्षा परिणामो में लड़कियो का श्रेष्ठ परिणाम होने के बाद भी वे उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाती है, क्योकि माता पिता लड़को कि शिक्षा पर अधिक खर्च करते हैं। देश में पुरुषो कि अपेक्षा महिलाए एक घण्टा अधिक कार्य करे तो भी उसको अधिक वेतन नहीं दिया जाता।
© ​भारत में समान मजदुरी अधिनियम के तहत समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाना अनिवार्य है, फिर भी देश में महिलाओ को वेतन कम दिया जाता है।
​देश में अनेक माता-पिता केवल लड़के कि चाहत रखते है, इसलिए लिंगानुपात गिरकर प्रति 1000 पुरुषो पर 919 (वर्तमान में 943) है, आज भी महिलाए घरेलू हिंसा एंव महिला उत्पीड़न की शिकार होती है। शहरो मे भी महिलाए अपने घर मे भी सुरक्षित नहीं है।
​नारीवाद :- महिला एवं पुरुषों को समान अवसर एंव अधिकार प्रदान करने वाली विचारधारा को नारीवाद कहते है।
​पितृ प्रधान :- पितृ प्रधान शब्द का शाब्दिक अर्थ पिता का शासन होता है। अर्थात महिला कि अपेक्षा पुरूषो को अधिक महत्व एवं अधिकार प्रदान करना पितृ प्रधान कहलाता है।
​महिलाओं का राजनैतिक प्रतिनिधित्व :- भारत कि विधायिका में महिला प्रतिनिधित्व का अनुपात बहुत कम है, जैसे :- लोक सभा में महिला सांसदो कि संख्या 2019 में पहली बार 14.36% तक पहुँच सकी है। जबकि राज्य विधान मण्डल मे महिलाओं का प्रतिनिधित्व 5% से भी कम है, अर्थात महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भारत आज भी पिछे है। इस समस्या के समाधान हेतु भारत ने स्थानीय शासन में महिलाओं के लिए (1/3) पद आरक्षित किए है। लोक सभा व राज्य सभा में भी महिलाओं के लिए पदों के आरक्षण का बिल संसद में निलम्बीत है।
​पारिवारीक कानुन :- विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार आदि परिवार से जुड़े मामले से सम्बन्धित कानुन पारिवारीक कानुन कहलाते है।
​धर्म एवं राजनीति के सन्दर्भ में गांधीजी के विचार :- गांधीजी के अनुसार धर्म हिन्दु या इस्लाम जैसे किसी भी धर्म से संबंधित नही था। लेकिन नैतिक मुल्य सभी धर्मो में निहित रहते है, अतः राजनीति को धर्म से लिए गए नैतिक मूल्यो द्वारा निर्देशीत होना चाहिए।
​→ भारत में मानवाधिकार आयोग के अनुसार साम्प्रदायिकता दंगो मे मरने वाले अधिकांश लोग अल्पसंख्यक समुदाय के है। अतः उनकी रक्षा के लिए कानून बनाना चाहिए।
​महिला आन्दोलन के अनुसार सभी धर्मो के कानुन महिलाओं के साथ भेद भाव करते है, अतः सरकार को समान कानुन बनाने चाहिए।
​साम्प्रदायिकता :- जब एक धर्म को दुसरे धर्म से श्रेष्ठ माना जाता है, तथा राज्य सत्ता का उपयोग किसी एक धर्म के पक्ष में करता है, एवं राजनीति को धर्म से जोड़ता है, उसे साम्प्रदायिकता कहते है। इसके अनुसार धर्म सामाजिक समुदाय का निर्माण करता है।
​साम्प्रदायिकता राजनीति के रूप में :-
① साम्प्रदायिक सोच वाले लोग अपने धार्मिक समुदाय का प्रभुत्व स्थापित करते है। जिससे अल्पसंख्यको मे अलग राजनीतिक इकाई बनाने कि भावना उत्पन्न होती है।
② कई बार साम्प्रदायिकता हिंसा, दंगा एवं नर संहार कराती है, जिससे देश के टूटने का खतरा बना रहता है। जैसे:- भारत पाकिस्तान विभाजन।
③ एक धर्म को दुसरे से श्रेष्ठ माना जाता है।
④ धर्म के आधार पर राजनीति एवं मतो का केन्द्रीयकरण होता है।
⑤ साम्प्रदायिकता के आधार पर राजनैतिक दलो का विभाजन होता है।
​धर्म निरपेक्षता :- ऐसी व्यवस्था जिसमे राज्य का कोई धर्म नहीं होता, राज्य सभी धर्मो को समान महत्व देता है, तथा राज्य का कोई भी नागरीक किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हो तो उसे धर्मनिरपेक्षता कहते है।
​धर्म निरपेक्ष शासन :- भारत के सविधान में धर्म निरपेक्ष शासन के मॉडल को अपनाया गया है। जिसमे निम्न प्रावधान किए गए है:-
​(i) भारत का सविधान किसी भी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।
(ii) सभी को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की जाती है।
(iii) नागरिक स्वेच्छा से किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतन्त्र है।
(iv) सविधान जाति व धर्म के आधार पर भेदभाव पूर्ण निषेध करता है।
(v) सविधान धार्मिक समुदायो समानता को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को धार्मिक मामलो मे हस्तक्षेप का अधिकार प्रदान करता है।
​जाति, धर्म असमानता :- प्राचीन कालीन वर्ण व्यवस्था आज की जाति व्यवस्था है, जो केवल भारतीय समाज में देखने को मिलती है, यह जाति व्यवस्था एक अतिवादी एवं स्थायी रूप जिसमे अनेक जातियाँ देखने को मिलती है।
​वर्ण व्यवस्था :- जाति समूहो का पदानुक्रम जिसमे एक जाति के लोग सामाजिक व्यवस्था मे सबसे ऊपर एंव अन्य समुह के लोग नीचे हो, ऐसी व्यवस्था को वर्ण व्यवस्था कहते हैं। इस व्यवस्था में उच्च जाति के लोग निम्न जातीय समूहों के साथ छुआछूत का व्यवहार करते हैं, इसलिए गाँधीजी, डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर तथा ज्योतिबा फुले आदि लोगो ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया। वर्तमान मे जाति व्यवस्था में बदलाव के कारण असमानता दुर होने लगी है, जिसका प्रमुख कारण आर्थिक विकास, शहरीकरण, शिक्षा, जमींदारी प्रथा का अंत आदि में बदलाव आया है।
​शहरीकरण :- ग्रामीण जनसंख्या का नगरों में जाकर बसना अर्थात गाँव का शहर में बदलना शहरीकरण कहलाता है।
​राजनीति में जाति :- सामाजिक समुदाय के गठन का आधार जाति है, जब लोग अपनी जाती को अन्य जाति से श्रेष्ठ मानने लगते है तथा अपने हितो के लिए राष्ट्रीयहितो का बलिदान करते है, तो उसे जातिवाद कहा जाता है। राजनीति में जाति को अनेक रूपो में देखा जा सकता है जैसे :-
① जाति के आधार पर उम्मीदवारो का नाम तय करना।
② जातिगत भावनाओं में वृद्धि करना।
③ जातिगत आधार पर राजनीतिक गोलबंदी।
④ जाति के आधार पर मतदान करना।
⑤ संसदीय क्षेत्र मे किसी एक जाति का बहुमत न होना।
​जाति के अन्दर राजनीति :- राजनीति ने विभिन्न जातियो को राजनैतिक अखाड़े मे लाकर जाति व्यवस्था एवं जातिगत पहचान को प्रभावित किया है, अतः कहा जा सकता है, कि राजनीति ही जाति ग्रस्त नहीं है, बल्कि जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है, अतः जाति के अन्दर राजनीति को अनेक रूपो में देखा जा सकता है, जैसे :-
① अपने समुह कि सभी उपजातियो को अपने साथ लाने कि कोशिश।
② दुसरी जातियों के साथ तोल-मोल व संवाद करना।
③ जातिगत गोलबंदी (अगड़ा व पिछड़ा)।
​जातिगत असमानता :- जाति के आधार पर आर्थिक विषमता देखने को मिलती है। उच्च जाति के लोग सामान्यतः धन सम्पन्न एवं अमीर होते हैं, जबकि दलित व आदिवासी सबसे निचे आते है। सबसे निम्न जातियो में गरीबी रेखा से निचे रहने वाले लोगो कि संख्या अधिक होती है, पिछड़ी जाति के लोग मध्यम श्रेणी में शामिल है। प्राचीन काल मे जातिया वर्ण व्यवस्था पर आधारित थी, तब से ही जातिगत भेदभाव प्रारम्भ हुआ। वर्तमान में सामाजिक राजनीतिक व आर्थिक दृष्टी से उच्च एंव निम्न, गरीब एवं अमीर आदि का भेद भाव उत्पन्न हुआ।
​अनुसूचित जाति :- वे जाति जो हिन्दु सामाजिक व्यवस्था में उच्च जाति से निम्न एवं अछूत मानी जाती है, उन्हे अनुसूचित जाति कहते है। इनकी कुल जनसंख्या लगभग 16.2% है।
​अनुसूचित जनजाति :- ऐसी जाति जो पहाड़ी व वन क्षेत्रो में रहती है तथा जिनका बाहरी समाज से मेल जोल न हो उन जातियो को अनुसूचित जनजाति कहते हैं। इनकी कुल जनसंख्या लगभग 8.2% है।

      महत्वपूर्ण प्रश्न 
​1 भारत में जनगणना कितने वर्ष बाद होती है?
उत्तर- 10 वर्ष  
​2 एक विचारधारा जो अधिकारों व अवसरों के मामले में महिलाओं को पुरुषों के समान मानती है वह है?
उत्तर- नारीवादी विचारधारा  
​3 पंचायती राज (स्थानीय सरकार) में महिलाओं के लिए कितने पद आरक्षित किये गये हैं?
उत्तर- एक तिहाई  
​4 समरूप समाज किन देशों में पाया जाता है?
उत्तर- स्वीडन व जर्मनी  
​5 सामाजिक असमानता का कौनसा रूप प्रत्येक स्थान पर दिखाई देता है?
उत्तर- लैंगिक असमानता  
​6 सामाजिक विभाजन अधिकांशतः किस पर आधारित होता है?
उत्तर- जाति-धर्म पर  
7 ​तलाक, विवाह व उत्तराधिकार से सम्बंधित कानून क्या कहलाता है?
उत्तर- पारिवारिक कानून  
8 ​महिलाओं को घरेलु उत्पीड़न से बचाने के लिए कोई एक उपाय बताइए?
उत्तर- घरेलु हिंसा अधिनियम व कानूनी नियमों की जानकारी देना।  
9 ​"धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता" कथन किसका है?
उत्तर- महात्मा गांधी का  
​10 2014 में लोकसभा में महिला सांसदों का कितना प्रतिशत है?
उत्तर- 14.36%  
​11 धर्म को राष्ट्र का आधार मानने पर कौनसी समस्या शुरू होती है?
उत्तर- साम्प्रदायिकता की  
​12 धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करने वाला व्यक्ति क्या कहलाता है?
उत्तर- धर्म निरपेक्ष  
​13 2011 के अनुसार भारत का लिंगानुपात कितना है?
उत्तर- 943  
​14 श्रम का लैंगिक विभाजन क्या है?
उत्तर- काम के बंटवारे का वह तरीका जिसमें घर के काम महिलाये करती हैं तथा बाहर के काम पुरुषों के द्वारा किये जाते हैं।  
​15 साम्प्रदायिक राजनीति का क्या अर्थ है?
उत्तर- जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाए तथा राजनीति में अन्य धर्म की तुलना में एक धर्म की श्रेष्ठता दर्शायी जाए तो उसे साम्प्रदायिक राजनीति कहते हैं।  
​16 वर्ण व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- जाति समूहों के पदानुक्रम जिसमें एक जाति समूह के लोग सामाजिक पायदान पर सबसे ऊपर रहेंगे तथा अन्य लोग नीचे रहेंगे।  
17 ​2011 के अनुसार भारत में महिला व पुरुष साक्षरता कितनी है?
उत्तर- पुरुष - 76%, महिला - 54%  
​18 जातिवाद से क्या आशय है?
उत्तर- जब राजनेता चुनावी लाभ के लिए जातिगत चेतना उकेरकर उसका लाभ उठाने का प्रयास करते हैं तो उस प्रक्रिया को जातिवाद कहते हैं।  
​19 भारत में लैंगिक विभाजन (विषमता) को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर- लैंगिक विभाजन का आशय पुरुषों व महिलाओं के बीच कार्य के विभाजन से है, जिसमें घरेलू कार्य महिलाएं व बाहर के कार्य पुरुषों द्वारा किये जाते हैं।  
​20 भारतीय राजनीति में जातिवाद की समस्या बताइए -
उत्तर-  
​उम्मीदवारों का चुनाव जातियों की संख्या के हिसाब से होता है।  
​जातिगत गोलबंदी व निम्न जातियों में राजनीतिक चेतना का उदय  
​सरकार के गठन में जातियों का प्रतिनिधित्व .
​प्रश्न 21. साम्प्रदायिकता के सबसे बुरे स्वरूप का एक उदाहरण दीजिये।
उत्तर- सम्प्रदाय के आधार पर हिंसा, दंगा और नरसंहार होना साम्प्रदायिकता का सबसे बुरा स्वरूप है। उदाहरण के लिए, विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान में भयावह साम्प्रदायिक दंगे हुए थे।
​प्रश्न 22. लैंगिक विभाजन का आशय बताइये।
उत्तर- लैंगिक विभाजन का आशय है समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच कार्यों का बंटवारा करना।
​प्रश्न 23. लैंगिक असमानता का आधार क्या है?
उत्तर- लैंगिक असमानता का आधार है— प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ।
​प्रश्न 24. 'औरतों की मुख्य जिम्मेवारी गृहस्थी चलाने और बच्चों के लालन-पालन करने की है।' यह बात किस विभाजन से झलकती है?
उत्तर- यह बात श्रम के लैंगिक विभाजन से झलकती है।
​प्रश्न 25. औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष को क्या कहा जाता है?
उत्तर- नारीवादी।
​प्रश्न 26. सामाजिक असमानता का कौन-सा रूप प्रत्येक स्थान पर दिखाई देता है?
उत्तर- लैंगिक असमानता का।
​प्रश्न 27. सन् 2011 में भारत के किन राज्यों में बाल लिंगानुपात 875 से भी कम था?
उत्तर- पंजाब, हरियाणा और जम्मू एवं कश्मीर में।
​प्रश्न 28. भारत में सन् 2011 में हिन्दू धर्मावलम्बियों की जनसंख्या कितने प्रतिशत थी?
उत्तर- 79.8 प्रतिशत।
​प्रश्न 29. श्रम के लैंगिक विभाजन से क्या आशय है?
उत्तर- काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अन्दर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं और बाहर के काम पुरुष।
​प्रश्न 30. नारीवादी आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- वे आंदोलन जो स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के लिए चलाए गए थे, नारीवादी आंदोलन कहे जाते हैं।
​प्रश्न 31. नारीवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर- नारीवाद एक विचार है जो यह कहता है कि स्त्रियों को भी समाज में वही स्थिति प्राप्त हो जो पुरुषों को प्राप्त है।
​प्रश्न 32. भारत में स्त्रियाँ पुरुषों से इतने पीछे क्यों हैं?
उत्तर- पितृसत्तात्मक समाज तथा शिक्षा व आर्थिक उन्नति के अवसरों की कमी के कारण।
​प्रश्न 33. पितृसत्तात्मक समाज कौन-सा होता है?
उत्तर- पितृसत्तात्मक समाज वह होता है जो पुरुष प्रधान होता है तथा परिवार का शासन पिता के हाथों में होता है।
​प्रश्न 34. शहरीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- किसी गाँव का शहर या कस्बे के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया को शहरीकरण कहते हैं। शहरीकरण में छोटे शहरों का विकास और विस्तार भी शामिल है।
​प्रश्न 35. लिंग अनुपात का क्या अर्थ है? / लिंगानुपात से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- किसी क्षेत्र में प्रति 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या को लिंगानुपात कहते हैं।
​प्रश्न 36. पारिवारिक कानूनों का क्या अर्थ है?
उत्तर- पारिवारिक कानून वे कानून हैं जो पारिवारिक मसलों— विवाह, गोद, तलाक, उत्तराधिकार आदि को हल करने के लिए बने हों।
​प्रश्न 37. साम्प्रदायिक राजनीति का क्या अर्थ है?
उत्तर- जब राजनीति में अन्य धर्मों की तुलना में एक धर्म की श्रेष्ठता दर्शायी जाए तो इसे साम्प्रदायिक राजनीति कहते हैं।
​प्रश्न 38. विश्व के किन देशों में सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर काफी ऊँचा है?
उत्तर- स्वीडन, नार्वे और फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में।
​प्रश्न 39. जातिवाद किस मान्यता पर आधारित है?
उत्तर- जातिवाद इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है।
​प्रश्न 40. जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज की व्यवस्था बनाने वाले दो समाज सुधारकों के नाम बताइए।
उत्तर- (i) ज्योतिबा फुले। (ii) ई.वी. रामास्वामी पेरियार।
​प्रश्न 41. श्रम के लैंगिक विभाजन का क्या परिणाम निकला?
उत्तर- इससे महिलाएँ तो घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गयीं और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्जे में आ गया।
​प्रश्न 42. भारत में जाति ने किन तरीकों से राजनीति को प्रभावित किया है?
उत्तर-
(1) राजनैतिक दलों द्वारा जाति के आधार पर उम्मीदवार चुनना।
(2) सरकार में विभिन्न जातियों के लोगों को प्रतिनिधित्व देना।
​प्रश्न 43. 'भारत में चुनाव में जाति के अतिरिक्त अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।' कोई दो कारक बताइये।
उत्तर-
(1) मतदाता जातियों से कहीं अधिक राजनीतिक दलों से अधिक जुड़ाव रखते हैं।
(2) एक ही जाति के अमीर और गरीब लोग प्रायः अलग-अलग पार्टियों को वोट देते हैं।
​प्रश्न 44. वर्ण व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- वर्ण व्यवस्था जाति समूहों का एक ऐसा पदानुक्रम है जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान में सबसे ऊपर रहेंगे तो किसी अन्य जाति समूह के लोग क्रमागत के रूप में उनके नीचे रहेंगे।
​प्रश्न 45. 2019 के लोकसभा निर्वाचन में महिला सांसदों की संख्या कितने प्रतिशत है?
उत्तर- 2019 के लोकसभा निर्वाचन में महिला सांसदों की संख्या 14.36 प्रतिशत है।
​प्रश्न 46. 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जन जातियों का हिस्सा कितना फीसदी था?
उत्तर- 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा 8.6 फीसदी था।
​प्रश्न 47. 'वोट बैंक' से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- वोट बैंक का तात्पर्य ऐसे लोगों के समूह से है जो हमेशा किसी विशेष राजनीतिक दल अथवा उम्मीदवार को वोट देते हैं।
​प्रश्न 48. गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 1999-2000 के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों का मतलब है प्रति व्यक्ति प्रति माह 327 रुपए (ग्रामीण) और 455 रुपये (शहरी) से कम खर्च करने वाले लोग।
​प्रश्न 49. "धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता।" यह किसने कहा था?
उत्तर- महात्मा गाँधी ने।
​प्रश्न 50. 2011 की जनगणना के अनुसार बाल लिंगानुपात कितना है?
उत्तर- 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश का बाल लिंगानुपात गिरकर 919 रह गया है।
​लघूत्तरात्मक प्रश्न एवं उत्तर
​प्रश्न 51. आपके अनुसार राजनीति में जाति अनेक रूप ले सकती है। अपने मत के पक्ष में किसी एक रूप की संक्षिप्त विवेचना कीजिये।
उत्तर- राजनीति में जाति अनेक रूप ले सकती है, जिनमें से एक रूप का वर्णन निम्नलिखित है—
चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन जातियों की संख्या के हिसाब से: जब राजनीतिक दल चुनाव हेतु उम्मीदवारों के नाम तय करते हैं तो चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखते हैं ताकि उन्हें चुनाव जीतने के लिए आवश्यक वोट मिल जाएँ।
​प्रश्न 52. लैंगिक असमानता का आधार क्या है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं। उदाहरण के लिए, औरतों की मुख्य जिम्मेवारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है। यह चीज अधिकतर परिवारों के श्रम के लैंगिक विभाजन से झलकती है।
​प्रश्न 53. लैंगिक विभाजन की राजनीतिक अभिव्यक्ति एवं राजनीतिक गोलबंदी से सार्वजनिक जीवन में औरतों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर- लैंगिक विभाजन की राजनीतिक अभिव्यक्ति एवं राजनीतिक गोलबंदी ने सार्वजनिक जीवन में औरतों की भूमिका बढ़ाने में मदद की है। इसी के परिणामस्वरूप आज हम वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षक जैसे पेशों में बहुत-सी औरतों को पाते हैं।
​प्रश्न 54. कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की क्या जरूरत है?
उत्तर- कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की आवश्यकता है; क्योंकि इससे वंचित समूहों को लाभ मिलता है, उन्हें बराबरी का दर्जा मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि महिलाओं से भेदभाव भरे व्यवहार का मुद्दा राजनीतिक तौर पर न उठता तो सार्वजनिक जीवन में भागीदारी नहीं मिलती।
​प्रश्न 55. धर्म और राजनीति के सम्बन्ध में गाँधीजी के क्या विचार थे?
उत्तर- महात्मा गाँधी के अनुसार धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। धर्म से उनका अभिप्राय नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं। गाँधीजी का मानना था कि राजनीति धर्म द्वारा स्थापित मूल्यों से निर्देशित होनी चाहिए।
​प्रश्न 56. धर्मनिरपेक्ष राज्य से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- धर्मनिरपेक्ष राज्य वह राज्य है जिसका अपना कोई राजकीय धर्म नहीं होता तथा जिसमें सभी नागरिकों को कोई भी धर्म अपनाने की स्वतंत्रता होती है। राज्य धर्म के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करता है।
​प्रश्न 57. साम्प्रदायिक राजनीति का क्या अर्थ है?
उत्तर- साम्प्रदायिक राजनीति का अर्थ है— राजनीति में धर्म का इस तरह प्रयोग कि एक धर्म दूसरे धर्म से श्रेष्ठ दिखने लगे। इनके अनेक रूप हैं, यथा—
(i) जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है।
(ii) जब राज्य अपनी सत्ता का प्रयोग किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगे।
​प्रश्न 58. 'अनुसूचित जाति' व 'अनुसूचित जनजाति' के नाम के आगे 'अनुसूचित' शब्द क्यों लगाया जाता है?
उत्तर- अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों की गिनती अलग से दर्ज की जाती है। इन दोनों व्यापक समूहों में सैकड़ों जातियाँ या जनजातियाँ शामिल हैं, जिनके नाम सरकारी अनुसूची में दर्ज हैं।

59 ​धर्मनिरपेक्षता के लक्षण बताइए?
उत्तर-  
​भारतीय संविधान धर्म आधारित भेदभाव को निषेध करता है।  
​भारत के संविधान में किसी भी धर्म को विशेष दर्जा नहीं दिया गया।  
​मौलिक अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता का प्रावधान किया गया है।  
60 ​धर्मनिरपेक्षता क्या है? भारत में धर्मनिरपेक्षता को क्यों अपनाया गया?
उत्तर- ऐसा शासन जिसमें राज्य किसी भी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता हो तथा सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता प्रदान करता हो उसे धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं। विभाजन के समय भारत-पाकिस्तान के बीच साम्प्रदायिक दंगे हुए थे, अतः भारतीय संविधान निर्माता इस चुनौती के प्रति सजग थे। इसी कारण से भारत में धर्मनिरपेक्षता का मॉडल अपनाया गया।  

Comments