भारत मे राष्ट्रवाद

                              अध्याय-2: भारत में राष्ट्रवाद

प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव:-

​प्रथम विश्व युद्ध के कारण रक्षा संबंधी खर्चों में वृद्धि हुई।

​रक्षा खर्च के कारण कर्ज तथा टैक्स में वृद्धि की गयी।

​सीमा शुल्क बढ़ाया गया तथा आयकर शुरू किया गया।

​सिपाहियों को जबरन भर्ती किया गया।

​1918-19 व 1920-21 में फसलें खराब हो गयीं, अतः खाद्यान्न का अभाव पैदा हो गया। और इसी समय फ्लू महामारी फैल गयी।

​1921 की जनगणना के अनुसार 120 से 130 लाख लोग मारे गए।

​* सत्याग्रह का विचार:-

​जनवरी 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। इन्होंने नए तरह के जन आंदोलन के रास्ते पर चलकर नस्लभेदी सरकार से सफलतापूर्वक संघर्ष किया।

​गांधीजी के अनुसार अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, तथा अन्याय के खिलाफ संघर्ष है, तो मुकाबला करने के लिए बिना शारीरिक बल के केवल अहिंसा के सहारे भी सफल हो सकते हैं।

​* चंपारण आंदोलन:-

​भारत आने के बाद गांधी जी ने 1917 में बिहार के चम्पारण का आंदोलन किया तथा दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।

​* खेड़ा आंदोलन:-

​फसल खराब होने के बाद व प्लेग महामारी के कारण गुजरात के खेड़ा जिले के किसान लगान चुकाने में असमर्थ थे। वे लगान की वसूली में छूट चाहते थे। अतः 1918 में गांधी जी ने खेड़ा के किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया था।

​* रौलट एक्ट:-

​भारतीयों के विरोध के बाद भी इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने 1919 में रौलट एक्ट पारित किया, जिसके तहत सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने के लिए बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में बंद रखने का अधिकार मिल गया।

​अतः 6 अप्रैल 1919 को गांधी जी ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल प्रारम्भ किया, जिसका लोगों ने समर्थन किया। दुकानें बंद हो गयीं, रेल कारखानों के मजदूर हड़ताल पर चले गए।

​अतः भयभीत अंग्रेजों ने राष्ट्रवादियों पर दमन शुरू किया तथा स्थानीय नेताओं को बंदी बना लिया गया। गांधीजी के दिल्ली में प्रवेश पर रोक लगा दी।

​* जलियांवाला बाग हत्याकांड:-

​10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में पुलिस ने शांतिपूर्ण जुलूस पर गोलियां चला दीं। अतः लोगों ने सरकारी संस्थाओं (बैंक, डाकघर) पर आक्रमण किया। इसके बाद अमृतसर में जनरल डायर के नेतृत्व में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया।

​13 अप्रैल को लोगों का एक समूह बैसाखी मनाने के लिए जलियांवाला बाग में एकत्रित हुआ। इस शांतिपूर्ण चल रही सभा में जनरल डायर ने बिना चेतावनी के गोलियां चला दीं तथा बाहर निकलने के रास्ते बंद कर दिए। इस घटना में सैकड़ों लोग मारे गए। इस घटनाक्रम के बाद चारों ओर हिंसा फैल गयी, अतः गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।

​जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद का घटनाक्रम:-

​लोग सड़कों पर उतर आए।

​हड़ताल होने लगी तथा लोग सरकारी इमारतों पर हमला करने लगे।

​गुजरांवाला गांव में (पंजाब) बम बरसाए गए।

​सत्याग्रहियों की नाक रगड़ने और अंग्रेजों को सलाम करने पर मजबूर किया गया।

​सरकार ने दमनकारी रवैया अपनाया तथा लोगों को अपमानित व आतंकित किया।

​* खिलाफत का मुद्दा:-

​खिलाफत शब्द 'खलीफा' से निकला है, जो कि ऑटोमन तुर्की का सम्राट व इस्लामिक विश्व का आध्यात्मिक नेता भी था।

​प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की हार गयी तथा यह अफवाह फैल गयी कि तुर्की पर एक अपमानजनक संधि थोपी जाएगी। इसलिए खलीफा की शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में अली बंधुओं (मोहम्मद अली व शौकत अली) द्वारा मुंबई में एक 'खिलाफत समिति' का गठन किया गया तथा गांधीजी से चर्चा शुरू की।

​सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन व स्वराज के लिए कांग्रेस का समर्थन लिया।

​* असहयोग आंदोलन क्यों?:-

​गांधी जी ने अपनी पुस्तक 'हिन्द स्वराज' में लिखा था कि भारत में ब्रिटिश राज भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था तथा इन्हीं के सहयोग से चल रहा था। यदि भारतीय सहयोग देना बंद कर दें, तो ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाएगा तथा स्वराज आ जाएगा।

​असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव:-

​विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।

​सरकारी उपाधियों को वापस लौटाना।

​सिविल सर्विस, सेना, पुलिस, कोर्ट व स्कूलों का बहिष्कार।

​यदि सरकार दमनकारी नीति से बाज न आए, तो संपूर्ण अवज्ञा आंदोलन शुरू करना।

​कांग्रेस के दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन पर स्वीकृति मिली तथा जनवरी 1921 में असहयोग-खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन में सभी के लिए स्वराज का अर्थ भिन्न था।

​शहरी आंदोलन:-

​यह आंदोलन शहरी मध्य वर्ग के साथ शुरू हुआ। हजारों विद्यार्थियों, वकीलों व शिक्षकों ने काम करना व स्कूलों का बहिष्कार किया। शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गयी तथा विदेशी कपड़ों की होली जलाई गयी।

​अतः 1921-22 में विदेशी कपड़ों के आयात की कीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गयी। व्यापारियों ने विदेशी वस्तुओं का व्यापार बंद कर दिया, जिससे भारतीय कपड़ा मिलों व हथकरघों का उत्पादन बढ़ने लगा।

​कुछ समय बाद आंदोलन धीमा पड़ने लगा। खादी कपड़ा महंगा होने के कारण गरीब उसे खरीद नहीं पाते थे, अतः वे अधिक समय तक विदेशी कपड़े का बहिष्कार नहीं कर सके। विद्यार्थी एवं शिक्षक स्कूलों में लौटने लगे तथा वकील भी अदालतों में दिखाई देने लगे।

​ग्रामीण क्षेत्रों में विद्रोह:-

​शहरों के साथ-साथ गांवों में भी आंदोलन प्रारम्भ हुआ। अवध में संन्यासी बाबा रामचंद्र किसानों का नेतृत्व कर रहे थे। इनका आंदोलन जमींदारों के खिलाफ था, जो किसानों से अधिक कर वसूलते थे। किसानों को बिना किसी पारिश्रमिक के 'बेगार' करनी पड़ती थी।

​अतः किसानों की मांग थी कि लगान को कम किया जाए। अक्टूबर 1920 में नेहरू जी तथा बाबा रामचंद्र व अन्य लोगों ने साथ मिलकर 'अवध किसान सभा' का गठन कर लिया।

​1921 के आंदोलन में व्यापारियों के मकानों पर हमले तथा बाजारों में लूटपाट होने लगी। अनाज के गोदामों पर कब्जा कर लिया गया।

​आदिवासियों ने गांधी जी के आंदोलन का गलत अर्थ निकाला तथा आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में उग्र गुरिल्ला आंदोलन चलाया। वन क्षेत्रों में लोगों के प्रवेश को निषेध किया गया था तथा लोगों को बेगार करने के लिए मजबूर किया गया, जिससे पहाड़ी क्षेत्र के लोग गुस्सा थे।

​अल्लूरी सीताराम राजू के विचारों से प्रभावित होकर लोगों ने पुलिस थानों पर हमले किए तथा ब्रिटिश अधिकारियों को मारने की कोशिश की। अतः 1924 में राजू को फांसी दे दी गयी।

​* बागानों में स्वराज:-

​'इंग्लैंड इमिग्रेशन एक्ट 1859' के अनुसार असम के बागानों में काम करने वाले मजदूरों को बिना अनुमति के बागान छोड़ना मना था। लेकिन असहयोग आंदोलन की खबर सुनकर मजदूरों ने अधिकारियों की बात मानने से मना कर दिया और बागान छोड़कर घर की तरफ चल दिए। इस समय रेलवे व स्टीमरों की हड़ताल के कारण वे रास्ते में ही फंस गए और पुलिस ने उन्हें पकड़कर बुरी तरह दंडित किया।

​कांग्रेस के द्वारा आंदोलन का सही अर्थ नहीं समझाने के कारण लोगों ने इसका अलग अर्थ निकाला तथा गांधी जी के नाम पर 'स्वतंत्र भारत' के नारे लगाए।

​* चौरी-चौरा कांड:-

​फरवरी 1922 में गोरखपुर के चौरी-चौरा के बाजार में शांतिपूर्ण गुजर रहे जुलूस पर पुलिस ने गोलियां चला दीं, अतः गुस्से में आकर लोगों ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी।

​इस हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।

​* सविनय अवज्ञा आंदोलन:-

​कांग्रेस के अनेक नेता गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 के तहत गठित काउंसिल चुनावों में भाग लेना चाहते थे। उनका मानना था कि परिषदों में रहते हुए अंग्रेजी नीतियों का विरोध करना महत्वपूर्ण था।

​इन चुनावों में भाग लेने को लेकर कांग्रेस में मतभेद था। चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने परिषद चुनाव में भाग लेने के लिए 'स्वराज पार्टी' का गठन किया।

​इस समय विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का दौर रहा। कृषि उत्पादों की कीमतें गिर गयीं, अतः किसानों के लिए लगान चुकाना भारी पड़ गया।

​* साइमन कमीशन:-

​भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली के अध्ययन के लिए 1927 में सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग में एक भी सदस्य भारतीय नहीं था।

​अतः 1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुंचा, तो 'साइमन कमीशन वापस जाओ' (Simon Go Back) के नारे लगाकर इसका विरोध किया गया।

​इस विरोध को शांत करने के लिए वायसराय लॉर्ड इरविन ने 'डोमिनियन स्टेटस' की गोलमोल घोषणा करते हुए कहा कि भावी संविधान पर चर्चा के लिए गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।

​इस प्रस्ताव से कांग्रेस के नेता संतुष्ट नहीं थे, अतः दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' की मांग को स्वीकार किया गया तथा 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

​* दांडी यात्रा / नमक यात्रा:-

​जनवरी 1930 में गांधी जी ने लॉर्ड इरविन के समक्ष अपनी 11 मांगें रखीं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण मांग नमक कानून को खत्म करना था। लेकिन इरविन ने मांगें नहीं मानीं, अतः 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपने 78 सहयोगियों के साथ साबरमती आश्रम से 240 किमी दूर दांडी तक की यात्रा शुरू की।

​6 अप्रैल 1930 को वे दांडी पहुंचे और वहां नमक बनाकर नमक कानून को तोड़ा।

​* सविनय अवज्ञा आंदोलन:-

​6 अप्रैल 1930 को गांधी जी ने नमक कानून का उल्लंघन कर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। इसके बाद हजारों लोगों ने नमक कानून को तोड़ा तथा नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किया। किसानों ने लगान देने से मना किया तथा विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया गया। आदिवासियों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया।

​अंग्रेजी सरकार ने कांग्रेस नेताओं को बंदी बनाना शुरू कर दिया। अब्दुल गफ्फार खान को गिरफ्तार किया गया तथा कुछ दिनों बाद गांधी जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। अतः लोगों ने पुलिस थानों, नगरपालिकाओं, अदालतों, रेलवे स्टेशनों आदि पर हमला किया। सरकार ने शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर बर्बर दमन किया, महिलाओं व बच्चों को पीटा तथा 1 लाख से अधिक लोगों को हिरासत में ले लिया। जब यह आंदोलन हिंसक होने लगा, तो गांधी जी ने इसे वापस ले लिया।

​* गांधी-इरविन पैक्ट / द्वितीय गोलमेज सम्मेलन:-

​5 मार्च 1931 को गांधीजी व लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ, जिसे 'गांधी-इरविन पैक्ट' कहा जाता है। इसके अनुसार गांधीजी लंदन में होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए सहमत हुए। इसके बदले में सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राजी हुई।

​दिसंबर 1931 में गांधीजी ने लंदन के सम्मेलन में भाग लिया, लेकिन वार्ता विफल हो गयी तथा गांधी जी को निराश होकर लौटना पड़ा।

​जब गांधीजी वापस भारत लौटे, तो उन्होंने देखा कि गफ्फार खान और जवाहरलाल नेहरू सहित अधिकांश नेता जेल में थे। कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था तथा सभाओं, बहिष्कार व धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गयी थी। अतः गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः शुरू किया, लेकिन 1934 तक यह आंदोलन कमजोर हो गया।

​आंदोलन के बारे में लोगों के मत:-

​किसान: संपन्न किसानों के लिए आंदोलन का अर्थ अधिक लगान के विरुद्ध लड़ाई थी। लेकिन बिना लगान कम किए आंदोलन बंद कर दिया गया, जिससे किसान निराश हुए तथा उन्होंने 1932 के दोबारा शुरू हुए आंदोलन में भाग नहीं लिया। छोटे किसान लगान माफी चाहते थे, क्योंकि वे लगान चुकाने में असमर्थ थे। अतः इन्होंने समाजवादी व मार्क्सवादी उग्र आंदोलनों में भाग लेना शुरू कर दिया।

​व्यवसायी: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय व्यवसायियों को अधिक लाभ प्राप्त हुआ था, अतः वे उन अंग्रेजी नीतियों एवं व्यावसायिक औपनिवेशिक पाबंदियों के खिलाफ थे जो व्यापार में बाधा थीं। 1920 में 'भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस' (IICC) तथा 1927 में 'भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ' (FICCI) का गठन किया गया। ये व्यवसायी ऐसा माहौल चाहते थे जिससे व्यवसाय में वृद्धि हो।

​औद्योगिक मजदूर: इस आंदोलन में औद्योगिक मजदूरों ने बहुत कम भाग लिया, क्योंकि उद्योगपति कांग्रेस के नजदीक थे। आंदोलन में कांग्रेस ने भी मजदूरों की मांगों को अनसुना किया।

​महिलाओं की भागीदारी: इस आंदोलन में महिलाओं ने भी बड़े पैमाने पर भाग लिया, जिनमें से अधिकांश महिलाएं शहरी क्षेत्रों के उच्च परिवारों और ग्रामीण क्षेत्रों के धनी वर्ग से थीं।

​सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएं:-

​गांधी जी ने छुआछूत को समाप्त करने पर बल दिया (अछूतों को हरिजन कहा)। लेकिन अनेक दलित नेताओं ने अछूतों के लिए शिक्षा में आरक्षण तथा अलग से निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की।

​डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 1930 में 'दमित वर्ग एसोसिएशन' (Depressed Classes Association) की स्थापना की।

​जब ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग मान ली, तो गांधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।

​अंततः गांधीजी व डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच सितंबर 1932 में 'पूना पैक्ट' (Poona Pact) समझौता हुआ।

​इस आंदोलन में मुस्लिमों ने भी विशेष उत्साह नहीं दिखाया, क्योंकि असहयोग-खिलाफत आंदोलन के धीमा पड़ने के बाद उन्हें भय था कि हिंदुओं के वर्चस्व की स्थिति में उनकी संस्कृति व पहचान खो जाएगी।

​मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना पृथक चुनाव की मांग को छोड़ने को तैयार थे, लेकिन वे केंद्रीय विधायिका में मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटें और मुस्लिम बहुल प्रांतों में प्रतिनिधित्व चाहते थे।

​* राष्ट्रवाद की भावना:-

​सामूहिक अपनेपन का भाव: जब लोग यह मानने लगते हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अभिन्न अंग हैं, तथा कोई बात उन्हें एकता के सूत्र में बांधकर रखती है, तो राष्ट्रवाद की भावना पनपती है। आजादी की लड़ाई में लोगों ने एकता पर बल दिया तथा अनेक सांस्कृतिक प्रक्रियाओं ने भी राष्ट्रवाद की भावना को यथार्थ करने में अपनी भूमिका निभाई।

​तस्वीरों में राष्ट्र (भारत माता की छवि): राष्ट्र की पहचान को चित्रों के द्वारा मूर्त रूप दिया जाने लगा। भारत माता का चित्र मातृभूमि की परिकल्पना को कागज पर उतारता था। बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870 के दशक में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' लिखा, जिसे बाद में बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान गाया गया। अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि को चित्रित किया।

​लोक कथाएं: अनेक नेताओं ने राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार करने के लिए लोक कथाओं व गीतों का सहारा लिया। उनका ऐसा मानना था कि लोक कथाएं पारंपरिक संस्कृति को दिखाती हैं जो बाहरी ताकतों के प्रभाव से भ्रष्ट हो चुकी हैं।

​इतिहास की पुनर्व्याख्या: अंग्रेजों ने भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया था तथा भारतीयों को पिछड़ा व आदिम बताते थे। अतः भारतीयों को लगा कि इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से जानने की आवश्यकता है। वे भारत के सुनहरे अतीत (प्राचीन काल की कला, विज्ञान, धर्म) को उजागर करना चाहते थे ताकि भारतीयों को गर्व महसूस हो सके।

​* भारत छोड़ो आंदोलन:-

​क्रिप्स मिशन की असफलता व द्वितीय विश्व युद्ध के प्रभावों के कारण भारत में व्यापक असंतोष ने जन्म दिया। अतः गांधी जी ने इस आंदोलन को शुरू किया।

​14 जुलाई 1942 को कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति ने वर्धा में 'भारत छोड़ो प्रस्ताव' को पारित किया, जिसमें अंग्रेजों से तुरंत सत्ता हस्तांतरण करने तथा भारत छोड़ने की मांग की गयी।

​8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। इस आंदोलन में गांधी जी ने "करो या मरो" का प्रसिद्ध नारा दिया।

​इस आंदोलन में बड़े पैमाने पर छात्रों, मजदूरों और किसानों ने भाग लिया। इसमें जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने भूमिगत गतिविधियां चलाईं। बंगाल में मातंगिनी हाजरा, असम में कनकलता बरुआ व उड़ीसा में रमा देवी आदि महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

​अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:-

​1928: दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' (HSRA) की स्थापना हुई, जिसमें भगत सिंह, जतिन दास, अजॉय घोष आदि शामिल थे।

​1929: भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका।

​साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज से लाला लाजपत राय पर हमला हुआ, जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

​1928: वल्लभभाई पटेल ने गुजरात के बारदोली में किसान आंदोलन का नेतृत्व किया, जो कि बढ़े हुए भू-राजस्व के खिलाफ था (बारदोली सत्याग्रह)।

​शब्दावली:-

​बेगार:- बिना किसी पारिश्रमिक (मजदूरी) के जबरन काम करवाना।

​गिरमिटिया मजदूर:- औपनिवेशिक काल में अनुबंध (एग्रीमेंट) के तहत अनेक लोगों को काम करने के लिए फिजी, गुयाना, वेस्टइंडीज आदि सुदूर देशों ले जाया गया, जिन्हें बाद में 'गिरमिटिया' कहा जाने लगा।

​पिकेटिंग:- प्रदर्शन या विरोध का वह रूप जिसमें लोग किसी दुकान, फैक्ट्री या दफ्तर के भीतर जाने का रास्ता रोक लेते हैं।

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