अध्याय-2: वन एवं वन्य जीव
भारत में वन एवं वन्य जीव:
भारत में जैव विविधता की दृष्टि से 16 लाख (8%) प्रजातियाँ पायी जाती हैं।
एक अनुमान के अनुसार भारत में 10% वनस्पति एवं 20% स्तनधारी जीवों के विलुप्त होने की कगार है। जैसे:- चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख, पहाड़ी कोयल आदि।
विभिन्न प्रकार की जातियाँ (IUCN के अनुसार):
संकटग्रस्त जातियाँ: वे जातियाँ जिनके विलुप्त होने की कगार पर हैं तथा इनकी संख्या लगातार घट रही है, तो उन्हें संकटग्रस्त जातियाँ कहते हैं।
जैसे: मगरमच्छ, गेंडा, काला हिरण, संगाई आदि।
सुभेद्य जातियाँ: वे जातियाँ जिनकी संख्या लगातार घट रही है, उन्हें सुभेद्य जातियाँ कहते हैं।
जैसे: नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा डॉल्फ़िन आदि।
दुर्लभ जातियाँ: वे जातियाँ जिनकी संख्या बहुत कम हो, उन्हें दुर्लभ जातियाँ कहा जाता है।
जैसे: हॉर्नबिल आदि।
स्थानिक जातियाँ: वे जातियाँ जो विशेष क्षेत्रों में पायी जाती हैं, उन्हें स्थानिक जातियाँ कहते हैं।
जैसे: अंडमानी सूअर, निकोबारी कबूतर, अंडमानी जंगली सूअर आदि।
विलुप्त जातियाँ: ऐसी जातियाँ जो वर्तमान में नहीं पायी जाती हैं, उन्हें विलुप्त जातियाँ कहते हैं।
जैसे: एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख आदि।
एशियाई चीता:
यह दुनिया का सबसे तेज़ स्तनधारी प्राणी है, जो बिल्ली की प्रजाति से संबंधित है।
यह 112 km प्रति घंटा की गति से दौड़ता है।
इसकी आँख से मुँह तक नाक के दोनों ओर आँसुओं जैसे निशान होते हैं।
भारत में यह प्रजाति 1952 में विलुप्त घोषित की जा चुकी थी।
विलुप्त होते वन:
देश में वन आवरण क्षेत्र में 78.92 मिलियन हेक्टेयर भूमि शामिल है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 24.16% (या 24.56%) है।
12.2% भाग पर सघन वन
9.14% भाग पर खुला वन
0.14% भाग पर मैंग्रोव वन है।
2015 वन नीति रिपोर्ट के अनुसार देश में सघन वन क्षेत्र में 3,775 वर्ग km की वृद्धि हुई। यह वृद्धि वृक्षारोपण का परिणाम है।
अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार वन्य प्राणी एवं वनों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
सामान्य जातियाँ: वे जातियाँ जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य है, उन्हें सामान्य जातियाँ कहते हैं। जैसे:- पशु, साल, चीड़, कृंतक (रोडेंट्स) आदि।
वनस्पति और प्राणीजात की संख्या में कमी आने के कारण:
मानव ने लकड़ी, छाल, दवाइियाँ, पत्ते, चारा, ईंधन आदि की प्राप्ति के लिए वन एवं वन्य जीवों को हानि पहुँचाई।
सबसे बड़ा नुकसान औपनिवेशिक काल में कृषि, रेल लाइन, खनन आदि के कारण हुआ।
वन सर्वेक्षण के अनुसार 1951 से 1980 के बीच लगभग 26,200 वर्ग km भूमि कृषि क्षेत्र में बदल गई।
उत्तर-पूर्वी एवं मध्य भारत में स्थानांतरी (झूमिंग) / 'श्लेष और बर्न' कृषि के कारण वनों में कमी आई।
1952 से बड़ी नदी घाटी परियोजनाओं ने भी वन क्षेत्र को प्रभावित किया। मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर परियोजना से वन भूमि में कमी आई।
पश्चिम बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व डोलोमाइट खनन के कारण खतरे में है, जो वन एवं प्राणीजात की संख्या को प्रभावित करता है।
वन एवं वन्य जीवों का संरक्षण:
वन एवं वन्य जीवों में तेज़ी से कमी आ रही है, अतः इनका संरक्षण अति आवश्यक है।
वन संरक्षण से पारिस्थितिकी विविधता बनी रहती है एवं हमारे जीवन साध्य संसाधन - वायु, जल तथा मृदा बने रहते हैं।
यह पौधों और जनन जातियों में जैव विविधता को संरक्षित करता है।
वन एवं वन्य जीव संसाधनों के प्रकार एवं वितरण:
आरक्षित वन: यह सबसे मूल्यवान वन हैं जो पूर्णतया सरकार के द्वारा आरक्षित हैं। देश के कुल वनों का आधा से ज़्यादा भाग इस श्रेणी में शामिल है।
रक्षित वन: यह देश के कुल वनों का 1/3 (एक-तिहाई) भाग हैं। इनको नष्ट होने से बचाने के लिए सरकार के द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है।
अवर्गीकृत वन: वह वन जो सरकार, निजी व्यक्तियों या समुदाय के स्वामित्व में हों, उन्हें अवर्गीकृत वन कहते हैं।
मध्य प्रदेश (M.P.) में 75% आरक्षित एवं रक्षित वन हैं।
जबकि जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, केरल एवं पश्चिम बंगाल में भी आरक्षित वन अधिक पाए जाते हैं।
पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, राजस्थान एवं बिहार में अवर्गीकृत वन अधिक पाए जाते हैं।
समुदाय एवं वन संरक्षण:
वन मानव समुदाय की आजीविका को भी प्रभावित करते हैं। भारत में कई स्थानीय समुदाय सरकार के साथ मिलकर वनों का संरक्षण कर रहे हैं।
सरिस्का बाग रिजर्व: राजस्थान के लोग वन्य जीव संरक्षण हेतु खनन बंद करवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अलवर (राजस्थान): अलवर ज़िले के 5 गाँवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर भूमि 'भैरोदेव डाकव सोंचुरी' घोषित की है, जिसमें अपने ही नियम-कानून चलते हैं।
चिपको आंदोलन: हिमालय का प्रसिद्ध चिपको आंदोलन कई क्षेत्रों में वन कटाई रोकने में सफल रहा।
बीज बचाओ आंदोलन: टिहरी में किसानों के 'बीज बचाओ आंदोलन' एवं 'नवधान्य' ने रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना जैविक कृषि उत्पादन में वृद्धि की है।
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM): इसके द्वारा 1988 के बाद संयुक्त वन प्रबंधन का कार्य किया जा रहा है। इसमें गाँव के लोग एवं वन अधिकारी मिलकर संयुक्त रूप से वनों का संरक्षण कर रहे हैं। सबसे पहला प्रस्ताव ओडिशा राज्य ने पास किया था।
वन्य जीव संरक्षण अधिनियम एवं बाघ परियोजना:
1980 और 1986 के तहत सैकड़ों तितलियों, पतंगों, भृंगों एवं एक ड्रैगनफ्लाई को भी संरक्षित जातियों में शामिल किया गया। 1991 में पौधों की भी 6 जातियाँ पहली बार इस सूची में रखी गईं।
बाघ परियोजना (Project Tiger):
बाघ महत्वपूर्ण वन्य जीव प्रजाति है। 1973 में अधिकारियों ने पाया कि देश में बाघों की संख्या घट रही है।
बाघ को मारकर बेचना, व्यापार करना, आवास स्थलों का सिकुड़ना, भोजन के लिए जंगली जीवों की कमी आदि के कारण इनकी संख्या घटी है।
भारत एवं नेपाल दुनिया की दो-तिहाई बाघों को आवास उपलब्ध कराते हैं।
1973 में 'प्रोजेक्ट टाइगर' शुरू किया गया। भारत में प्रमुख बाघ रिजर्व निम्न हैं:
उत्तराखंड: कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान
पश्चिम बंगाल: सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान
मध्य प्रदेश: बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान
राजस्थान: सरिस्का वन्य जीव अभयारण्य
असम: मानस बाघ रिजर्व
केरल: पेरियार बाघ रिजर्व
पवित्र पेड़ों के झुरमुट (देववाणी/Orans):
भारतीय प्राचीन काल से प्रकृति की पूजा करते रहे हैं, जिसका मूल आधार प्रकृति की रक्षा करना है।
अनेक पेड़-पौधों को पवित्र मानकर पूजा जाता है।
उदाहरण: छोटानागपुर क्षेत्र में मुंडा और संताल जनजातियाँ महुआ और कदंब के पेड़ों की पूजा करते हैं। ओडिशा व बिहार में विवाह के अवसर पर इमली और आम के पेड़ की पूजा की जाती है। कई लोग पीपल व बरगद की पूजा करते हैं।
अनेक मंदिरों में विभिन्न जीवों को पवित्र माना जाता है, जैसे:- बंदर, लंगूर आदि।
राजस्थान में बिश्नोई समाज के लोग काला हिरण, चिंकारा, मोर व नीलगाय को संरक्षण प्रदान करते हैं और वे उनके समाज का अभिन्न अंग हैं।
Comments
Post a Comment