अध्याय-VI: भारत के संदर्भ में नियोजन एवं सतत पोषणीय विकास
नियोजन: किसी कार्य को करने की पूर्व तैयारी, रूपरेखा बनाना तथा उसको लागू करना नियोजन कहलाता है। किसी भी देश में विकास के लिए अपनाये गये नियोजन के दो रूप (उपागम) होते हैं:
1 खण्डीय नियोजन प्रादेशिक नियोजन
खण्डीय नियोजन: इसमें अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, सिंचाई, परिवहन, उद्योग आदि के सम्बन्ध में योजनाएं बनाना व लागू करना खण्डीय नियोजन कहलाता है।
प्रादेशिक नियोजन: किसी प्रदेश के लिए उसके सभी संसाधनों के उचित उपयोग तथा प्रादेशिक असमानता को कम करने के लिए व विकास के लिए योजना बनाकर लागू करना ही प्रादेशिक नियोजन कहलाता है।
भारत में नियोजन का कार्य योजना आयोग के द्वारा किया जाता था लेकिन 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग का स्थान नीति आयोग ने लिया।
भारत में योजना आयोग का गठन 15 मार्च 1950 को हुआ था। वर्तमान में इसका (नीति आयोग) अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है।
लक्ष्य क्षेत्र नियोजन: भारत में क्षेत्रीय व सामाजिक विषमताओं को नियंत्रित रखने के लिए योजना आयोग ने लक्ष्य क्षेत्र एवं लक्ष्य समूह योजना उपागमों को प्रस्तुत किया। जैसे—कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम, पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम, सूखा सम्भावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम आदि। इनके अलावा लघु किसान विकास संस्था एवं सीमान्त किसान विकास संस्था आदि कार्यक्रम चलाए गये। पर्वतीय क्षेत्र, पिछड़े क्षेत्र एवं जनजाति क्षेत्र तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास के लिए 8वीं पंचवर्षीय योजना में विशेष योजना बनाई गई।
पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम: पर्वतीय क्षेत्रों के विकास हेतु पांचवीं पंचवर्षीय योजना में देश के 15 जिलों में पर्वतीय विकास कार्यक्रम चलाया गया। इसके अन्तर्गत उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिले (अब उत्तराखण्ड), असम, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग, नीलगिरी की पहाड़ी आदि में आरम्भ किया गया। 1981 में पिछड़े क्षेत्रों पर गठित समिति के द्वारा 600 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले योजना से वंचित क्षेत्रों को भी इस कार्यक्रम से जोड़ने की सिफारिश की गई।
राष्ट्रीय समिति ने इन क्षेत्रों के विकास के लिए निम्न सुझाव दिये:
- सभी लोग विकास की योजना से लाभान्वित होंगे।
- स्थानीय संसाधनों एवं प्रतिभाओं का विकास।
- जीवन निर्वाह अर्थव्यवस्था को निवेश उन्मुखी बनाना।
- अन्त: प्रादेशिक व्यापार में पिछड़े क्षेत्रों का शोषण न हो।
- पिछड़े क्षेत्रों की बाजार व्यवस्था में सुधार हो।
- पारिस्थितिकी सन्तुलन को बनाए रखा जा सके।
इन क्षेत्रों के विकास की योजना स्थलाकृति, सामाजिक पारिस्थितिकी व आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। यह कार्यक्रम बागवानी, रोपण कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन, वानिकी व ग्रामीण उद्योगों के विकास व संसाधनों के उपयोग को ध्यान में रखकर चलाये गये।
सूखा सम्भावित क्षेत्र विकास कार्यक्रम:
इस कार्यक्रम की शुरुआत सूखा सम्भावी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने तथा सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए चौथी पंचवर्षीय योजना में की गई। 5वीं पंचवर्षीय योजना में इसका विस्तार किया गया तथा ऐसे निर्माण कार्यों पर बल दिया गया जिनमें श्रमिकों की आवश्यकता अधिक हो। इस कार्यक्रम में सिंचाई, चारागाहों का विकास, विद्युत, सड़क, बाजार, ऋण आदि पर बल दिया गया। पिछड़े क्षेत्रों में विकास के इस कार्यक्रम की समीक्षा करने पर पता चला कि यह केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित है। सूखा सम्भावी क्षेत्र में वैकल्पिक रोजगार खोजने की आवश्यकता है तथा समन्वित जलसम्भर विकास कार्यक्रम पर बल दिया गया।
1967 में योजना आयोग ने भारत के 67 जिलों को सूखा सम्भावित जिले घोषित किया। 1972 में सिंचाई विभाग ने 30% सिंचित क्षेत्र को आधार मानकर सूखा क्षेत्रों का परिसिमन किया। राजस्थान, गुजरात, M.P., महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश का रायलसीमा, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु की उच्च भूमि में यह फैला हुआ है। राजस्थान, पंजाब व हरियाणा में नहरी सिंचाई सुविधा के कारण सूखे की संभावना को नियंत्रित किया गया है।
भरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम:-
हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले की दो तहसीलें—होली व भरमौर इस जनजातीय क्षेत्र में शामिल हैं। यह क्षेत्र 32°11' से 32°41' उत्तरी अक्षांश तथा 76°22' से 76°53' पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है। इसका क्षेत्रफल 1818 \text{km}^2 है। इस क्षेत्र को 21 नवम्बर 1975 को जनजातीय क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया गया।
यहाँ मुख्य रूप से गद्दी जनजाति निवास करती है, जिनकी भाषा गद्दीयाली है। इस क्षेत्र में कठोर जलवायु, संसाधनों की कमी तथा सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन देखने को मिलता है।
2011 के अनुसार यहाँ की कुल जनसंख्या 39,113 तथा जन घनत्व 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। यह हिमाचल का पिछड़ा क्षेत्र है। यहाँ कृषि, भेड़-पालन व बकरी-पालन प्रमुख व्यवसाय हैं।
यह क्षेत्र पीरपंजाल व धौलाधार श्रेणी के बीच स्थित है। इस क्षेत्र को बुढ़ील व टुंडाह नदियाँ चार भूखण्डों—होली, खणी, कुगती व टुंडाह में विभाजित करती हैं। यहाँ जनवरी में बर्फ जमाव व जुलाई में 26°C तापमान रहता है।
1974 में 5वीं पंचवर्षीय योजना के तहत भरमौर में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम (ITDP) प्रारम्भ किया गया। इस योजना के अन्तर्गत परिवहन, संचार, कृषि, विद्यालय, चिकित्सा, सड़क आदि का विकास करके इस क्षेत्र को विकसित करने की योजना बनाई गई।
इस योजना के लागू होने से यहाँ सामाजिक सुधार, साक्षरता में वृद्धि, लिंगानुपात में सुधार, बाल विवाह में कमी दर्ज की गई। यहाँ 1971 में 1.88% महिला साक्षरता थी, जो 2011 में बढ़कर 65% हो गई।
सतत पोषणीय विकास (धारणीय विकास):-
विकास शब्द का अर्थ समाज की स्थिति तथा उसके द्वारा अनुभव किये गये परिवर्तन की प्रकृति से लिया जाता है। विकास बहुआयामी संकल्पना है। विकास अर्थव्यवस्था, समाज, पर्यावरण आदि में सकारात्मक परिवर्तन का परिचायक होता है। विकास एक गतिज संकल्पना है जो 20वीं सदी में आरम्भ हुई।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय विकास एक आर्थिक वृद्धि थी, जिसे सकल घरेलू उत्पाद (GDP), प्रति व्यक्ति आय आदि के रूप में मापा जाता था। लेकिन वर्तमान में लोगों के कल्याण, जीवन स्तर, स्वास्थ्य, शिक्षा, समान अवसर तथा राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक अधिकारों को भी इसमें शामिल किया गया। 1980 के बाद पर्यावरण संबंधी जागरूकता को ध्यान में रखकर सतत पोषणीय विकास पर बल दिया गया।
1968 में प्रकाशित एहरलिच की पुस्तक "द पापुलेशन बम" तथा 1972 में मीडोज की पुस्तक "द लिमिट्स टू ग्रोथ" में पर्यावरण की चिंता व्यक्त की गई।
पर्यावरणीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए UNO के द्वारा विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (WECD) की स्थापना की गई, जिसकी प्रमुख नॉर्वे की प्रधानमंत्री ग्रो हरलेम ब्रंटलैंड थीं। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट "अवर कॉमन फ्यूचर" 1987 में प्रस्तुत की, जिसमें सतत पोषणीय विकास को परिभाषित करते हुए लिखा कि:
"ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किये बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना।"
सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने वाले उपाय:-
जल प्रबंधन नीति को कठोरता से लागू करना। इसके अन्तर्गत दो चरण विकसित किये गये हैं—पहले चरण में कमान क्षेत्र में फसल सिंचाई तथा दूसरे चरण में चारागाह विकसित करने के लिए विस्तृत सिंचाई का विकास किया गया।
इस क्षेत्र में फसल प्रतिरूप में बागवानी कृषि में खट्टे फलों की कृषि पर बल दिया गया।
कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम जैसे नालों को पक्का करना, भूमि विकास, बाड़बंदी आदि को प्रभावी रूप से विकसित करना।
जलाक्रांतता, लवणता आदि से ग्रसित भूमि का पुनः उद्धार करना।
वृक्षों की रक्षण मेखला व चारागाहों को विकसित करना।
गरीब भूमि मालिकों को वित्तीय सहायता प्रदान करना।
कृषि व पशुपालन के साथ-साथ अन्य अर्थव्यवस्थाओं के क्षेत्रों को विकसित करना।
इन्दिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र:
इसे राजस्थान नहर के नाम से भी जाना जाता है। इस परियोजना का प्रारूप 1948 में कंवर सेन ने बनाया था। यह नहर मार्च 1958 को प्रारम्भ हुई। यह पंजाब में हरीके बैराज से निकलती है तथा इसकी कुल नियोजित लम्बाई 906 km है। इसका कमान क्षेत्र 19.63 लाख हेक्टेयर है।
इस नहर का निर्माण दो चरणों में किया गया:
प्रथम चरण: इसका कमान क्षेत्र गंगानगर, हनुमानगढ़ व बीकानेर जिले में था, जहाँ 5.53 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित हुई।
द्वितीय चरण: इसमें बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, चूरू, जोधपुर व नागौर के 14.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल किया गया।
इसमें लिफ्ट नहर के द्वारा ढाल के विपरीत जल को मशीनों से ऊपर उठाया जाता है। सभी लिफ्ट नहरें बायीं ओर निकलती हैं।
इस नहर के प्रथम चरण की शुरुआत 1960 के दशक में व दूसरे चरण की शुरुआत 1980 के दशक में आरम्भ हुई। इस नहर से पर्यावरण व अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव पड़े हैं:
सकारात्मक प्रभाव: अर्थव्यवस्था में सुधार, वनीकरण, चारागाह तथा कृषि क्षेत्र में विस्तार।
नकारात्मक (पर्यावरणीय) प्रभाव: सघन सिंचाई, जलभराव (सेम), मृदा लवणता जैसी पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
इसके कारण बाजरा व चने के स्थान पर गेहूं, मूंगफली, कपास आदि बोया जाने लगा।
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