जल संसाधन

 अध्याय- Ⅳ. जल संसाधन

​भारत में जल संसाधन

​जल एक चक्रीय संसाधन है। जो पृथ्वी के 71% भाग पर पाया जाता है। जिसका 97% भाग महासागरीय (लवणीय) है जबकि शेष 3% भाग मीठा व शुद्ध (अलवणीय) जल है। भारत में विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.45% तथा जनसंख्या का 16% भाग है जबकि जल संसाधन केवल 4% है। भारत में एक वर्ष में लगभग 4000 घन किमी. जल वर्षा से प्राप्त होता है जबकि भौमजल 1869 घन किमी. है। जिसका 60% भाग उपयोग में (1122 घन किमी.) लिया जा सकता है।

​धरातलीय जल संसाधन :-

​धरातलीय जल के मुख्य स्रोत नदी, झील व तालाब हैं। भारत में 1.6 किमी से अधिक लम्बी नदियां 10360 हैं। जिनसे प्रतिवर्ष 1869 घन किमी जल प्राप्त होता है। जिसका केवल 32% (690 घन किमी) ही उपयोग में लिया जाता है। भारत में गंगा-सिन्धु, ब्रह्मपुत्र नदियों का जल ग्रहण क्षेत्र देश के 1/3 भाग पर जिनमें कुल धरातलीय जल का 60% भाग पाया जाता है।

​भौम जल संसाधन

​भारत में 432 घन किमी. भौमजल पुनः पूर्तियोग्य है। उत्तर-पश्चिम व भारत में भौमजल का अधिक उपयोग होता है। पंजाब, हरियाणा, U.P. आदि राज्यों में भौमजल का उपयोग अधिक होता है जबकि छत्तीसगढ़, उड़ीसा, केरल जैसे राज्यों में बहुत कम उपयोग किया जाता है। यदि जल का उपयोग ऐसे ही होता रहा तो जल की मांग की पूर्ती नहीं हो पाएगी। जिससे सामाजिक अराजकता बढ़ जाएगी।

​लैगून व पश्चजल

​भारत के विशाल तटीय क्षेत्रों में अनेक लैगून झीलें पायी जाती हैं जिनका जल खारा होता है। इस जल से चावल व नारियल की कृषि तथा मछली पालन किया जा सकता है। केरल, उड़ीसा व प. बंगाल में यह जल संसाधन अधिक उपयोग में लिया जाता है।

​जल की मांग और उपयोग:

​भारत एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाला देश है जिसकी अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। सिंचाई के विकास हेतु भारत में भाखड़ा नांगल, इन्दिरा गाँधी, हीराकुण्ड, दामोदर घाटी आदि परियोजनाएं चलाई गई। फिर भी सिंचाई हेतु जल की मांग अधिक है। क्योंकि जल का अधिकांश उपयोग कृषि क्षेत्र में किया जाता है।

​कृषि क्षेत्र में धरातलीय जल का 89% तथा भौमजल का 92%, औद्योगिक क्षेत्र में धरातलीय जल का 2% तथा भौम जल का 5% उपयोग में लिया जाता है। इसके अलावा घरेलू क्षेत्र में भी जल का उपयोग किया जाता है। भविष्य में उद्योग व घरेलू क्षेत्र में उपयोग बढ़ने की संभावना है।

​सिंचाई हेतु जल की मांग:

​जल का अधिकांश उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है लेकिन देश के अधिकांश भाग वर्षाविहीन एवं सूखाग्रस्त हैं तथा शीत व ग्रीष्म ऋतु में शुष्कता पाई जाती है जिससे कृषि करना कठिन होता है। अतः सिंचाई की आवश्यकता अधिक होती है। पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र बिहार व बंगाल में भी मानसून के मौसम में कम वर्षा होने से सूखा की स्थिती उत्पन्न होती है।

​सिंचाई सुविधा बहुफसलीकरण को बढ़ाती है। क्योंकि सिंचाई से उत्पादन अधिक होता है। अधिक उपज देने वाली किस्मों के लिए नमी बनाए रखना सिंचाई से ही सम्भव है। इसी कारण पंजाब, हरियाणा, U.P. में हरित क्रान्ति सफल हुई थी। इन राज्यों में 85% भाग सिंचित है। तथा बोये गये क्षेत्र का 76.1% भाग पंजाब व 51.3% हरियाणा में कुओं व नलकूपों से सिंचित है।

​भौम जल के उपयोग से जल स्तर गिर रहा है। राज., महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भौम जल के अधिक उपयोग से शेष जल में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ रही है। यही कारण है कि बंगाल व बिहार में संखिया (Arsenic) की मात्रा बढ़ी है।

​सम्भावित जल समस्या :

​जनसंख्या बढ़ने के कारण जल की उपलब्धता कम हो रही है तथा उपलब्ध जल संसाधन औद्योगिकीकरण, कृषि व घरेलू अपशिष्टों से दूषित हो रहे हैं। जिससे शुद्ध जल की उपलब्धता कम होती जा रही है।

​जल के गुणों का हास

​शुद्ध जल में बाहरी पदार्थों के मिलने से जल के गुणों में कमी आती है जिसे जल के गुणों का हास (जल प्रदूषण) कहते हैं। सूक्ष्म रासायनिक पदार्थ, औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू अपशिष्ट आदि जल को दूषित करते हैं। इन्हें जल प्रदूषक कहते हैं। इनके जल में घुलने से जल मानव के उपयोग योग्य नहीं रहता है। यह पदार्थ नदी, झील, तालाब आदि में मिल जाते हैं तो जल प्रदूषण बढ़ जाता है। जिससे जल तंत्र प्रभावित होता है। यह प्रदूषक कभी-कभी भूमि के अन्दर तक पहुंच कर भौम जल को भी प्रदूषित करते हैं।

​जल संरक्षण व प्रबन्धन :

​शुद्ध जल की घटती उपलब्धता व बढ़ती मांग के कारण सतत पोषणीय विकास के लिए जल संरक्षण व प्रबन्धन अति आवश्यक है। महासागरीय जल की उपयोगिता अधिक लागत के कारण बहुत कम है। अतः जल संरक्षण हेतु प्रभावशाली नीतियों व कानून, जल संरक्षण की तकनीकि विधियों, प्रदूषण नियन्त्रण के लिए जन जागरूकता जैसे उपाय किये जाने चाहिए।

​जल प्रदूषण का निवारण-

​देश में जल का अधिक उपयोग कृषि, उद्योग एवं घरेलू कार्यों में किया जा रहा है जिससे जल संसाधनों में कमी आ रही है। कृषि व उद्योगों में अधिक उपयोग से जल भण्डार दूषित हो रहे हैं। अतः केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मिलकर 507 स्टेशनों की जल संसाधनों की गुणवत्ता की जाँच की जा रही है जिसके अनुसार नदियों में प्रदूषण का मुख्य स्रोत जीवाण्विक प्रदूषक हैं। दिल्ली व इटावा के बीच यमुना भारत की सबसे दूषित नदी है तथा अहमदाबाद में साबरमती, हैदराबाद में मूसी, लखनऊ में गोमती, मदुरई में काली, अड्यार व कुअम, कानपुर, वाराणसी में गंगा दूषित नदियां हैं।

​सरकार के द्वारा प्रदूषण निवारण व नियंत्रण हेतु जल अधिनियम 1974, पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986, बनाए तो गए लेकिन पूर्णतः लागू नहीं हुए। जिससे 1997 में प्रदूषण फैलाने वाले 251 उद्योग नदी व मिलों के किनारे विकसित हुए। अतः 1977 में जल प्रदूषण को कम करने के लिए जल उपकर अधिनियम पारित किया गया।

​जल का पुनः चक्र और पुनः उपयोग -

​जल एक पुनः उपयोग योग्य चक्रीय संसाधन है जिसके द्वारा अलवणीय जल की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सकता है। कम गुणवत्ता वाला जल उद्योगों के लिए एक विकल्प है। इस जल का उपयोग शीतलन एवं अग्निशमन में किया जा सकता है। नगरों में स्नान एवं घरेलू कार्यों में प्रयुक्त जल को कृषि कार्यों में उपयोग में लिया जा सकता है।

​जल सम्भर प्रबन्धन

​जल सम्भर प्रबन्धन का अर्थ भौम जल संसाधनों के उत्तम प्रबन्धन से है जिसके तहत जल को रोकने के लिए तालाब, कुएं आदि का निर्माण व जल संग्रहण करना है। मानवीय संसाधनों के संरक्षण-पुनः उत्पादन व विवेकपूर्ण उपयोग को भी इसमें शामिल किया गया है। जिसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों में सन्तुलन बनाना है।

​केन्द्र सरकार के द्वारा जल प्रबन्धन के लिए हरियाली परियोजना आरम्भ की गई। जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, मछली पालन व वृक्षारोपण के लिए जलापूर्ति करना है।

​आन्ध्र प्रदेश राज्य में नीरू-मीरू (जल और आप) तथा राजस्थान के अलवर में अरवारी पानी संसद कार्यक्रम के द्वारा जल संग्रहण हेतु लोगों के सहयोग से तालाब, जोहड़ आदि की खुदाई की गई तथा बांध बनवाये गए। तमिलनाडु में जल संरक्षण हेतु प्रत्येक घर में जल संग्रहण के स्रोत का निर्माण अनिवार्य किया गया।

​वर्षा जल संग्रहण:-

​वर्षा जल को रोकने व एकत्र करने की विधि जिसके द्वारा प्राप्त जल से भूगर्भिक जल को बढ़ाया जाता है तथा उपयोग में लिया जाता है। यह कम मूल्य पर जल संग्रहण करने की विधि है। इससे वर्षा जल संग्रहण के साथ बाढ़ को भी नियंत्रित किया जाता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक विधियों के द्वारा वर्षा जल संग्रहण का कार्य किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में झील, तालाब, खड़ीन आदि के द्वारा जल संग्रहण किया जाता है। जबकि पश्चिमी राजस्थान में वर्षा जल संग्रहण हेतु टांका (कुण्ड) का निर्माण किया जाता है। यह संरचना आंगन अथवा घर के समीप वर्षा जल संग्रहण के लिए विकसित की जाती है।

​भारतीय राष्ट्रीय जल नीति 2002:

​इस नीति के द्वारा जल आवंटन प्राथमिकता के रूप में सिंचाई, पेयजल, उद्योग, जल शक्ति आदि में उपयोग के लिए निम्न लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं:

​सिंचाई व बहुउद्देश्यीय परियोजना में पेयजल को शामिल किया जाये तथा पेयजल स्रोतों के अभाव वाले क्षेत्रों में जल आपूर्ति की जानी चाहिए।

​पेयजल की सभी मानव बस्तियों को आपूर्ति करवाने को प्राथमिकता हो।

​भौमजल के शोषण को सीमित किया जाना चाहिए।

​जल की गुणवत्ता के लिए नियमित जाँच की जानी चाहिए।

​जल की गुणवत्ता सुधारने के लिए कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए।

​दुर्लभ जल संसाधन के लिए जागरूकता विकसित करनी चाहिए।

​शिक्षा, विनिमय, उपक्रम व प्रेरकों के द्वारा संरक्षण चेतना बढ़ानी चाहिए।

​जल संरक्षण की विधियां:

​गड्ढों के द्वारा जल संरक्षण।

​सर्विस कूप के द्वारा जल संरक्षण।

​पुनर्भरण कूपों के द्वारा जल संरक्षण।

​चेक डेम के द्वारा जल संरक्षण।

​जल क्रान्ति अभियान 2015-16-

​जल एक चक्रीय संसाधन है जिसकी मांग जन-वृद्धि व आर्थिक विकास के कारण बढ़ती जा रही है। भारत सरकार ने 2015-16 में प्रत्येक व्यक्ति तक जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए यह अभियान चलाया। इसका मुख्य लक्ष्य स्थानीय निकाय, सरकारी संगठन व नागरिकों को इस योजना से जोड़ना था। इसके अन्तर्गत निम्न बिन्दुओं को आधार माना गया-

​जल ग्राम बनाने के लिए देश के 672 जिलों में से प्रत्येक जिले में एक जल अभाव वाला गाँव चुना गया।

​देश के 1000 हेक्टेयर क्षेत्र को मॉडल कमाण्ड क्षेत्र बनाया गया जिसमें RJ, UP, GJ, तमिल, मेघालय आदि राज्यों को शामिल किया गया।

​जल प्रदूषण को कम करने के लिए जल संरक्षण व जल पुनर्भरण कार्य किया गया।

​लोगों को जागरूक करने के लिए जन संचार माध्यम, TV, रेडियो, प्रिंट मीडिया, पोस्टर, निबंध प्रतियोगिता आदि को प्रभावी माना गया।

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