III- - भूसंसाधन तथा कृषि :-
मानव भूमि को अपने आवास, उत्पादन, मनोरंजन आदि कार्यों में एक संसाधन के रूप में प्रयोग करता है। अतः भूमि एक संसाधन है।
• भू-उपयोग वर्गीकरण : भू राजस्व विभाग देश के भूमि उपयोग से संबंधित अभिलेख रखता है। भारत की प्रशासकीय इकाइयों की भौगोलिक क्षेत्रों की सही जानकारी देने का कार्य भारतीय भू राजस्व सर्वेक्षण विभाग का होता है। जिसके अनुसार भू उपयोग का वर्गीकरण निम्न है
① वनों के अधिन क्षेत्र — सरकार के द्वारा वन क्षेत्रों का सिमांकन इस प्रकार किया है जहाँ वन विकसित हो सके। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की वहाँ वास्तविक रूप से वन पाये जायेंगे ।
② बंजर एवं व्यर्थ भूमि : वह भूमि जिसे वर्तमान तकनीकि की सहायता से भी कृषि योग्य नहीं बनाया जा सके उसे इस वर्ग में शामिल किया जाता है। जैसे, मरूस्थल, बंजर पहाड़ी भूभाग आदि।
③ गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि — इस वर्ग में ग्रामीण व शहरी बस्तियाँ, सड़क, नहरें, उद्योग, आदि कार्यों में प्रयुक्त भूमि को शामिल किया जाता है। गैर कार्यों में प्राथमिक कार्यों में वृद्धि से इस वर्ग के भू उपयोग में वृद्धि हुई है।
④ स्थायी चारागाह भूमि : इस प्रकार की भूमि ग्रामपंचायत या सरकार के स्वामित्व में होती है। लेकिन भूमि का छोटा भाग निजी स्वामित्व में भी होता है। ग्रामपंचायत के स्वामित्व वाली भूमि को साझा सम्पति संसाधन भी कहते हैं।
⑤ विभिन्न तरू फसलों व उपवनों के अन्तर्गत क्षेत्र- इस वर्ग में उस भूमि को शामिल किया जाता है जिस पर उद्यान व फलदार वृक्ष लगे हो। इस प्रकार की भूमि नीजि स्वामित्व में होती है।
⑥ कृषि योग्य व्यर्थ भूमि — वह भूमि जो 5 वर्ष या इससे अधिक समय तक परती रहती है वह कृषि योग्य व्यर्थ भूमि कहलाती है इस तकनीकि की सहायता से उपयोग योग्य बनाया जा सकता है
7 वर्तमान परती भूमि — वह भूमि जो एक वर्ष या उससे कम समय के लिए कृषि रहित रहती है ऐसे वर्तमान परती भूमि कहते भारत में भूमि की गुणवता को बनाए रखने के लिए परती रखना एक सांस्कृतिक परम्परा है।
8 पुरातन परती भूमि :- यह भूमि कृषि योग्य होती है जो एक वर्ष से अधिक एवं 5 वर्ष से कम समय के लिए कृषि रहित रहती है उसे पुरातन परती भूमि कहते है।
9 निवल बोया क्षेत्र — वह भूमि जिस पर प्रतिवर्ष फसल बोई जाती है उसे निवल बोया गया क्षेत्र कहते हैं।
भारत में भू-उपयोग परिवर्तन
किसी भी क्षेत्र में भू-उपयोग वहाँ की आर्थिक क्रियाओं की प्रवृति पर निर्भर है। अर्थात आर्थिक क्रियाओं के साथ भूमि उपयोग में भी परिवर्तन होता है।
(i) अर्थव्यवस्था का आकार समय के साथ बढ़ता जाता है जो बढ़ती जनसंख्या, बदलता आय का स्तर तथा तकनीकि पर निर्भर है। अतः भूमि पर दबाव बढ़ता है। तथा सीमांत भूमि को भी प्रयोग में लाया जाता है।
(ii) समय के साथ बदलती अर्थव्यवस्था की संरचना विकसित देशों में एक सामान्य बात है।
( ) कृषि भूमि पर बढ़ते दबाव के कारण पिछले पाँच दशकों में अर्थव्यवस्था में
(iii) कृषि भूमि पर बढ़ते दबाव के कारण कृषि पर निर्भर जनसंख्या बढ़ती जा रही है।
(iv) कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान तीव्रता से कम होता जा रहा है। पिछले 5 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रमुख बदलाव आये है। जिसने भू-उपयोग परिवर्तन को प्रभावित किया हो तथा निम्न क्षेत्रों में वृद्धि हुई।
(i) गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि क्षेत्र में अधिक वृद्धि हुई है जिसका प्रमुख कारण अर्थव्यवस्था की बदलती संरचना मुख्य जिसमें मुख्यतः उद्योग व सेवा क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही
(ii) देश में वन क्षेत्र में वृद्धि सीमांकन के कारण हुई है। न की वास्तविक वनाच्छादन के कारण ।
(iii) वर्षा की अनियमितता व फसल चक्रण के कारण परती क्षेत्र में परिवर्तन होता रहा है।
(iv) कृषि के लिए कृषि योग्य व्यर्थ भूमि के उपयोग के कारण बोये गए क्षेत्र में वृद्धि एक वर्तमान घटना है
कुछ क्षेत्रों के भू-उपयोग में परिवर्तन में कमी आयी है जो निम्न है
(i) समय के साथ कृषि भूमि एवं गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि पर दबाव बढ़ा है। जिससे व्यर्थ एवं कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में कमी आयी है।
(ii) कृषि भूमि पर दबाव के कारण चारागाह भूमि में भी कमी आयी है
-: साझा सम्पति संसाधन :-
इसे सामुदायिक प्राकृतिक संसाधन भी कहते है इसे दो भागों में विभाजित किया जाता है - निजी सम्पति व साझा सम्पति संसाधन। निजी सम्पति की भूमि पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है। जबकी साझा सम्पति सामुदायिक उपयोग हेतु सरकार के स्वामित्व में होती है।
• भारत में कृषि भू उपयोग :-
गैर प्राथमिक क्रियाओं की अपेक्षा कृषि पूर्णत, भूमि पर आधारित है अन्त भूमि हिनता का सम्बन्ध गरिवी से है।
(ii) भूमि की गुणवता कृषि उत्पादकता को अधिक प्रभावित करती है।
(iii) ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि स्वामित्व का आर्थिक व सामाजिक मूल्य होता है। अतः भूमि विपत्ति में सुरक्षा का एक माध्यम है।
भारत में कृषि भूमि के बढ़ने की सम्भावनाएँ बहुत कम है अतः भूमि बचत तकनीकि विकसित करना अत्ती आवश्यक है। इस तकनीकि को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है
① फसल उत्पादन में वृद्धि करना।
② गहन कृषि प्रणाली अपनाना ।
फसल गहनता की गणना निम्न सूत्र की सहायता से की जाती है
भारत में फसल ऋतुएँ:
भारतीय फसलों को मुख्यतः तीन ऋतुओं में विभाजित किया जाता है
① खरीफ की फसल — इसे जून-जुलाई में बोया जाता है तथा सितम्बर, अक्टुबर में काट लिया जाता है। यह पश्चिमी मानसून के साथ बोई जाती है। इसकी प्रमुख फसल चावल कपास, जूट, बाजरा आदि है।
② रबी की फसल; यह अक्टूबर नवम्बर में शरद ऋतु में बोई आती है। तथा मार्च अप्रैल में काट ली जाती है। इसकी प्रमुख फसल गैहूँ, जौ, चना, सरसो आदि प्रमुख है।
③ जायद की फसल — यह अल्पकालीक ग्रीष्मकालीन फसल है। इसे मार्च-अप्रैल में बोया जाता है तथा मई जून में काट ली जाती है। इसकी प्रमुख फसल तरबूज, खीरा, ककड़ी, सब्जियां व चारा है।
कृषि के प्रकार
आर्द्रता के आधार पर कृषि को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है - ① सिंचित कृषि ② बारानी कृषि
① सिंचित कृषिः सिंचाई के उद्देश्य के आधार पर सिंचित कृषि दो प्रकार की होती है।
(अ) रक्षित सिंचाई - इसका उद्देश्य नमी की कमी के कारण फसलों को नष्ट होने से बचाना है।
(ब) उत्पादक कृषि - इसका उद्देश्य अधिक उत्पादन करने के लिए सिंचाई करना है।
② बारानी (वर्षापर निर्भर) कृषि : वर्षा पर निर्भर कृषि को आर्द्रता के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जाता है.
(अ) शुष्क भूमि कृषि - भारत में शुष्क भूमि कृषि औसत 75cm से कम वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती। जैसे चना, रागी, बाजरा, मूग,
(ब) आर्द्र भूमि कृषिः यह कृषि 75cm औसत वार्षिक वर्षा से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है। जैसे-चावल, जूट, गन्ना आदि।
खाद्यान्न फसल: देश की अर्थव्यवस्था में खाद्यान्न फसल का महत्वपूर्ण योगदान है। देश के कुल बोये गये क्षेत्र के दो-तिहाई भाग पर खाद्यान्न फसलें उगाई जाती है। प्रमुख खाद्यान्न फसल निम्न हैं-
अनाज: भारत में कुल बोये गये क्षेत्र के 54% भाग पर अनाज बोया जाता है। भारत विश्व का 11% अनाज उत्पादन के साथ - अमेरिका व चीन के बाद तीसरे स्थान पर है।
चावल:
चावल भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसल है। यह उष्ण आर्द्र कटिबंधीय फसल है जिसकी 3000 से अधिक किस्में है। भारत में चावल पूर्वी भारत के आर्द्र क्षेत्रों से लेकर उत्तर-पश्चिम के शुष्क सिंचित क्षेत्र पंजाब, हरियाणा, UP व राजस्थान में बोया जाता है। दक्षिणी राज्यों व प. बंगाल में अनुकुल जलवायु के कारण चावल की तीनों फसले अमन (शीत), ओस (शरद), बोरो (गर्मी) उत्पादित की जाती है। (2018) भारत विश्व का 22.7% चावल उत्पादन करके चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। देश में कुल बोये गये क्षेत्र के 1/4 भाग पर चावल बोया जाता है। भारत के प्रमुख चावल उत्पादक राज्य प. बंगाल, UP व पंजाब है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन की दृष्टि से पंजाब, तमिलनाडु, हरियाणा, आन्ध्रप्रदेश, प. बंगाल आदि अग्रणी राज्य है।
पंजाब व हरियाणा में 1970 के बाद हरित क्रान्ति के कारण चावल का उत्पादन प्रारम्भ हुआ। यहाँ उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक तथा अधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली अनुकुल जलवायु के कारण उत्पादन अधिक होता है।
गेहूँ:-
गेहूँ भारत की दूसरी प्रमुख खाद्यान्न फसल है। भारत विश्व का 12.8% गेहूँ का उत्पादन करता है। यह एक शीतोष्ण कटिबन्धीय, रबी की फसल है गेहूँ गंगा का मैदान, मालवा पठार, एवं हिमालय पर्वत श्रेणी में 2700m की ऊंचाई तक बोया जाता है। यह देश के कुल बोये गये क्षेत्र के 14% भाग पर गेहूँ की कृषि की जाती है। भारत में प्रमुख गेहूँ उत्पादक राज्य U.P., M.P., पंजाब, हरियाणा व राजस्थान है। पंजाब व हरियाणा में 4000 kg / हेक्टेयर गेहूँ का उत्पादन होता है। जबकी U.P., बिहार व राजस्थान में उत्पादन कम होता है।
Note-देश के कुल बोये गये क्षेत्र के 16.5% भाग पर मोटे अनाज बोये जाते है
ज्वार :-
भारत के कुल बोये गये क्षेत्र के 5.3% भाग पर ज्वार बोया जाता है। यह दक्षिण व मध्य भारत के अर्ध शुष्क क्षेत्रों में बोयी जाने वाली फसल है। देश की 50% से अधिक ज्वार का उत्पादन महाराष्ट्र राज्य करता है। इसके अलावा कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, MP, तेलंगाना अन्य उत्पादक राज्य है। यह एक खरीफ की फसल है। लेकिन दक्षिणी राज्यों में रबी व खरीफ दोनों में बोयी जाती है। ज्वार भारत में मुख्यता चारा फसल के रूप में बोयी जाती है।
बाजरा :-
बाजरा भारत के उत्तर पश्चिमी भागों में गर्म व शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में बोया जाता है। यह फसल एकल व मिश्रित रूप में बोयी जाती है। यह देश के कुल बोये गये क्षेत्र के 5.2% भाग पर बोई जाती है। यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, UP, राजस्थान व हरियाणा राज्य में बोया जाता है। राजस्थान में वर्षा की अनियमितता के कारण बाजरा का उत्पादन कम होता है। जबकि गुजरात व हरियाणा में सिंचाई सुविधा के कारण उत्पादन में वृद्धि हुई है।
मक्का — मक्का एक खाद्यान्न व चारा फसल अर्धशुष्क जलवायु वाले क्षेत्र में बोई जाती है। यह देश के कुल बोये गये क्षेत्र के 3.6% भाग पर बोई जाती है। यह पूर्व तथा उत्तर पूर्वी भारत को छोड़कर देश के सभी भागों में बोई जाती है। भारत में मुख्यतः कर्नाटक, MP, बिहार, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान व UP में मक्का का उत्पादन अधिक किया जाता है।
दलहन -
दालें एक प्रोटिन युक्त शाकाहारी भोजन का अंग है। यह फलीदार फसले नाइट्रोजन योगीकरण के द्वारा मिट्टी की उर्वरकता बढ़ाती है। भारत दालों का प्रमुख उत्पादक देश है। देश में कुल बोये गये क्षेत्र के 11% भाग पर दालें बोयी जाती है
चना —
चना एक उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में बोयी जाने वाली रबी की फसल है। यह देश के मध्य, पश्चिमी एवं उत्तर पश्चिमी भागों में बोयी जाती है। इस फसल के लिए दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। यह देश के कुल बोये गए क्षेत्र के 2.8% भाग पर बोई जाती है। हरित क्रान्ति के बाद इसके उत्पादन में कमी आयी है। चना मुख्यतः M.P., महाराष्ट्र, UP, आन्ध्रप्रदेश व राजस्थान में बोया जाता है।
अरहर / तुर / तुअर / पिजन पी :
यह देश की दूसरी प्रमुख दलहन फसल है। इसे लाल चना व पिजन पी के नाम से भी जाना जाता है। यह देश के कुल बोये गए क्षेत्र के 2% भाग पर बोई जाती है। यह देश के मध्य व दक्षिणी राज्यों के शुष्क भागों में बोई जाती है। इसके प्रमुख उत्पादन राज्य महाराष्ट्र, UP, कर्नाटक, गुजरात व mp. में बोई जाती है। अरहर के कुल उत्पादन का 1/3 भाग अकेले महाराष्ट्र राज्य में उत्पादित होता है।
-- तिलहन फसल :- --
तिलहन फसल का उत्पादन तेल प्राप्ति के लिए किया जाता है। यह देश के कुल बोये गये क्षेत्र के 14% भाग पर बोई जाती है। यह मूंगफली, सरसो, सोयाबीन, सुरजमुखी आदि प्रमुख तिलहन फसल है।
1- मूँगफली :-
भारत विश्व की 18.8% मूंगफली का उत्पादन करता है। यह शुष्क क्षेत्रों में बोयी जाने वाली खरीफ की फसल है। लेकिन दक्षिण भारत में यह रबी की ऋतु में बोई जाती है। मूंगफली देश के कुल बोये गये क्षेत्र के 3.6% भाग पर बोई जाती है। भारत में इसका उत्पादन गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु व आन्ध्र प्रदेश राज्यों में किया जाता है।
तोरिया व सरसो —
यह उपोष्ण कटिबन्धीय रबी की फसल इसमें राई, सरसो, तोरिया, ताराभिरा आदि को शामिल किया जाता है। यह भारत के मध्य व उत्तर-पश्चिमी भागों में बोयी जाती है। यह देश के कुल बोये गये क्षेत्र के 2.5% भाग पर बोयी जाती है। तिलहन फसल का 1/3 भाग राजस्थान में उत्पादित होता है। अन्य उत्पादक राज्य हरियाणा, MP, गुजरात व पंजाब है।
अन्य तिलहन फसल -
(i) सोयाबीन - यह एक तिलहन फसल है जिसका उत्पादन MP. व महाराष्ट्र राज्यों में किया जाता है।
(ii) सूरजमुखी :- इसका उत्पादन राजस्थान, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना आदि राज्यों में किया जाता है।
: रेशेदार फसल - :
इन फसलों का उपयोग कपड़ा, बैग, रस्सी, आदि बनाने में किया जाता है। इसकी प्रमुख फसल निम्न है-
कपास :-
कпас एक उष्ण कटिबन्धीय फसल है जो अर्ध शुष्क क्षेत्रों में खरीफ की ऋतु में बोई जाती है। पिछले 50 वर्षों में कपास उत्पादन में वृद्धि हुई हैं। देश में छोटे रेशे वाली भारतीय कपास तथा लम्बे रेशे वाली अमेरिकन कपास बोयी जाती है। भारत में अमेरिकन कपास को नरमा कहा जाता है। भारत विश्व में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश है। भारत में कुल बोये गये क्षेत्र के 4.7% भाग पर कपास बोया जाता है। सिंचाई सुविधाओं के कारण उत्तर-पश्चिमी भाग में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, तथा दक्षिण में तेलंगाना - कर्नाटक, व तमिलनाडु में कपास अधिक बोया जाता है।
- जूट-
यह एक रेशेदार फसल है। इसका उपयोग बोरे, वस्त्र, बैग, बोरी, रस्सी आदि बनाने में किया जाता है। भारत विश्व का 60% जूट उत्पादन करता है। इसके बाद दूसरे स्थान पर बांग्लादेश है। भारत का 3/4 भाग जूट का उत्पादन बंगाल करता है यह कुल बोये गये क्षेत्र के 0.5% भाग पर बोया जाता है। अन्य उत्पादक राज्य बिहार व असम है।
- गन्ना :-
गन्ना एक उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र व उपआर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में बोयी जाने वाली फसल है यह गंगा-सिंधु मैदान में अधिक बोया जाता भारत में सर्वाधिक गन्ने का उत्पादन U.P. में किया जाता है। इसके अलावा कर्नाटक, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, गुजरात आदि अन्य उत्पादक राज्य UP में 50% गन्ना भारत विश्व में 19.7% गन्ना उत्पादन के साथ ब्राजील के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत के कुल बोये गये क्षेत्र के 2.4% भाग पर बोया जाता है।
चाय —
चाय एक रोपण फसल है। यह आर्द्र व उपोष्ण आर्द्र कटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में बोई जाती चाय का उपयोग पेय पदार्थ के रूप में किया जाता है। काली चाय की पत्तियाँ किण्वित तथा हरी चाय की पत्तियाँ अकिण्वित होती है। चाय में कैफिन व टैनिन की प्रधानता होती है। यह चीन की फसल है इसे पहली बार 1840 में असम में ब्रह्मपुत्र घाटी में बोया गया था। इसका उत्पादन प० बंगाल में दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी व कूच बिहार में किया जाता है दक्षिण भारत में नीलगिरी की पहाड़ी व इलायची की पहाड़ी पर भी इसका उत्पादन किया जाता भारत विश्व की 21.22% चाय उत्पादन कर चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। असम के कुल बोये गये क्षेत्र के 53.2% भाग पर चाय का उत्पादन किया जाता है।
कॉफी : कॉफी एक रोपण फसल है जो उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में बोयी जाती है इसके बीजो को भूनकर पीसा जाता है तथा एक पेय पदार्थ के रूप में उपयोग में लिया जाता इसकी तीन किस्में होती है। अरेबिका, रोबस्टा व लिबेरिका। भारत विश्व प्रसिद्ध अरेबिका किस्म का उत्पादन करता है भारत विश्व का 3.2% कॉफी उत्पादन कर विश्व में ब्राजील, वियतनाम, कोलम्बिया, इन्डोनेशिया, हौंडुरस, इथोपिया व पेरू के बाद प्रमुख उत्पादक देश भारत में कर्नाटक (सर्वाधिक), केरल व तमिलनाडु प्रमुख कॉफी उत्पादक राज्य है
भारत में कृषि विकास :
आजादी से पहले देश कृषि आधारित व्यवस्था वाला था लेकिन विभाजन के दौरान सिंचित भूमि पाकिस्तान में चले जाने के कारण भारत में सिचित भूमि का अनुपात घट गया। अतः इस समय सरकार का मुख्य उद्देश्य खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाना था जिसके लिए निम्न प्रयास किये गये ।
① खाद्यान्न फसल उत्पादन में वृद्धि ।
② कृषि गहनता को बढ़ाना।
③ बंजर व परती भूमि को कृषि भूमि में बदलना ।
इस नीति से खाद्यान्न उत्पादन में तो वृद्धि हुई है लेकिन कृषि उत्पादन स्थिर रहा। इस समस्या के समाधान हेतु गहन कृषि जिला कार्यक्रम [IADP] व गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम [IAAP] आरम्भ किये गये । इस समय अकाल के कारण खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ। अतः खाद्यान्न का आयात करना पड़ा। 1960 के दशक में मेक्सिको से गेहूँ व फिलिपींस से चावल की फसल के उत्तम बीज उपलब्ध हुए। जिसका लाभ उठाते हुए भारत ने पैकेज प्रौद्योगिकी के रूप में पंजाब, हरियाणा, U.P., आन्ध्र प्रदेश, गुजरात के सिंचित क्षेत्रों में रासायनिक खाद की सहायता से उत्पादन प्रारम्भ किया। जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई। जिसे हरित क्रान्ति के नाम से जाना जाता है।
इस कान्ति ने कृषि निवेश, उर्वरक, किटनाशक व कृषि उपकरणों पर आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया। जिससे देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना। यह कान्ति केवल सिंचित क्षेत्रों तक सिमित थी। जिससे देश के विकास में प्रादेशिक असमानता बढ़ गई। अतः 1980 के दशक में योजना आयोग ने कृषि समस्याओं की ओर ध्यान दिया। तथा असन्तुलन को दूर करने के लिए कृषि जलवायु नियोजन प्रारम्भ किया।
सतत् कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन [NMSA]:
यह मिशन कृषि को सतत कृषि के लिए स्थाई विशिष्ट, पारिश्रमिक व जलवायु के अनुकुल बनाने के लिए प्रमुख मिट्टी, एवं नमी संरक्षण उपाय के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने सम्बन्धित है। इस योजना के तहत सरकार ने P.K.V.Y. परम्परागत कृषि विकास योजना व R.K.V.Y. [राष्ट्रीय कृषि विकास योजना] चलाई।
कृषि उत्पादन में वृद्धि तथा प्रौद्योगिकी का विकासः
पिछले 5 दशकों में कृषि उत्पादन एवं प्रौद्योगिकी में विकास हुआ है। जिसे निम्न विन्दुओं से समझा जा सकता है-
(i) चावल, गेहूँ, गन्ना, कपास व तिलहन फसलों में प्रभावशाली वृद्धि हुई।
(ii) सिंचाई ने फसल उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(iii) उत्तम किस्म के बीज, रासायनिक उर्वरक, किटनाशक व मशीनों के उपयोग ने कृषि को आधार प्रदान किया।
(iv) देश के विभिन्न क्षेत्रों में तिव्र गति से नवीन तकनीकि का विस्तार हुआ जिसके कारण पिछले 40 वर्षों में रासायनिक उर्वरको का उपयोग तिव्र गति से बढ़ा ।
- भारत का किसान पोर्टल :
किसानों को कृषि से सम्बन्धित जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए यह वेब पोर्टल एक खुला मंच है जिसमें किसान बीमा, कृषि भण्डारण, उत्तम बीज, कृषि यंत्र, किटनाशक, कृषि कार्यक्रम, कल्याणकारी योजनाएँ, आदि की जानकारी व मानचित्र उपलब्ध करवाये जाते है। इसके माध्यम से किसान फार्म फ्रेंडली हेन्डबुक, योजना दिशा निर्देश आदि डाउनलोड कर सकते है
-: भारतीय कृषि की समस्याएँ :-
परिस्थिति एवं एतिहासिक अनुभव के साथ देश में विभिन्न प्रकार की कृषि समस्याएँ है। जो निम्न है
① अनियमित मानसून पर निर्भरता :- देश में कृषि का 1/3 भाग सिंचित है जबकि शेष फसलों का उत्पादन वर्षा पर निर्भर करता देश में मानसून की अनियमितता से नहरी जलापूर्ती भी प्रभावित होती कम/अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सूखा पड़ता तथा कभी-2 बाढ़ भी आती जैसे 2006 व 2017 में महाराष्ट्र, गुजरात, व राजस्थान में बाढ़ आना।
② निम्न उत्पादकता : भारत में अन्य देशों की तुलना में उत्पादन कम होता चावल, गेहुँ व कपास जैसी फसलों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन भारत में अमेरिका-रूस, जापान, जैसे देशों की तुलना में कम है भारत में कृषि की वर्षा पर निर्भरता, शुष्क क्षेत्रों में कृषि मोटे अनाज व दलहन का उत्पादन अधिक किया जाता है।
③ वित्तीय संसाधनों की बाध्यता व ऋणग्रस्तता — आधुनिक कृषि में लागत खर्च बढ़ा है तथा छोटे किसानों की बचत कम हुई वर्तमान संसाधनों की सहायता से की जाने वाली कृषि में किसान निवेश करने में असमर्थ है। अतः कृषि के लिए किसान किसी बैंक, संस्था, या महाजन से ऋण लेता है तथा कम उत्पादन एवं फसल खराब होने के कारण किसान कर्ज में डूब जाता है
④ भूमि सुधार में कमी:- भूमि के असमान वितरण से किसान पीडित है। ब्रिटिश कालीन महालवाड़ी, रयतवाड़ी व जमींदारी प्रथा ने किसानों का शोषण किया। आजादी के बाद भूमिसुधार को प्राथमिकता तो दी गई लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति के कारण सफल नहीं हो पायी जिससे देश में भूमि का वितरण असमान
⑤ छोटे खेत तथा विखण्डित जोत — देश में छोटे किसानों की संख्या अधिक है। लगभग 60% किसानों के पास 1 हेक्टेयर से भी कम भूमि है। जबकी 40% किसानों के पास 0.5 हेक्टेयर से भी कम भूमि बढ़ती जनसंख्या के कारण खेत का आकार बिखरा हुआ व छोटा होता जा रहा यह छोटे खेत आर्थिक रूप से अलाभकारी है।
⑥ वाणिज्यीकरण का अभाव : अधिकांश किसान अपनी आवश्यकता की पूर्ती हेतु कृषि करते हैं इन किसानों के पास अधिक उत्पादन के लिए पर्याप्त भूमि नहीं होती यह किसान इतना ही खाद्यान्न उत्पादन करते है, जितने से इनकी पारिवारीक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।
⑦ व्यापक अल्प बेरोजगारी — देश के असिंचित क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर बेरोजगारी पायी जाती जिसमें मौसमी / ऋतुविक बेरोजगारी अधिक जोकि 4 से 8 माह तक रहती है। फसल ऋतु में भी वर्षभर रोजगार नहीं मिल पाता है। क्योंकि भारत में कृषि गहन कृषि कम होती है।
⑧ कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण — भूमि निम्नीकरण कृषि विकास की दोषपूर्ण नीति से उत्पन्न एक समस्या है। यह गंभीर समस्या इसलिए है क्योंकि इससे भूमि अनुपजाऊ होती तथा जलाकांतता, लवणता व मृदा क्षारता के कारण भूमि बंजर होती है अधिक किटनाशकों के प्रयोग से मृदा परिच्छेदिका में जहरीले तत्व एकत्र हो जाते है जिससे भूमि की पुनः उर्वरकता की शक्ति कम हो जाती है।
Note-राष्ट्रीय जलनीति 2012 व गंगा संरक्षण से सम्बन्धित जानकारी w.w.w. WRMIN.IN पर उपलब्ध है।
Comments
Post a Comment