औद्योगिकीकरण का युग

 ​अध्याय-4: औद्योगिकीकरण का युग

​पूर्व-औद्योगिकीकरण (Proto-Industrialization)       यूरोप में कारखानों की स्थापना से पहले के काल को पूर्व-औद्योगिकीकरण का काल कहते हैं। ​इस समय शहरी व्यापारी ग्रामीण क्षेत्रों में निर्यात उत्पादों को खरीदते थे।

​व्यापारियों का गाँव पर ध्यान देने का कारण:         शहरों में व्यापार एवं शुल्क संघ (Trade Guilds / Unions) अधिक शक्तिशाली होते थे। यह किसानों को कर्ज देते थे।    ​इस तरह के संगठन प्रतिस्पर्धा एवं कीमत पर नियंत्रण रखते थे तथा नए लोगों को बाजार में काम करने से रोकते थे।  अतः व्यापारियों के लिए शहरों में नया व्यापार शुरू करना मुश्किल होता था, इसलिए व्यापारी शहरों की बजाय गाँवों में अधिक ध्यान देते थे।

​ब्रिटेन में पूर्व-औद्योगिकीकरण के लक्षण:

  • ​गाँवों में किसानों को व्यापारियों के द्वारा पैसे दिए जाते थे तथा किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पाद बनाने के लिए प्रोत्साहित करते थे।
  • ​गाँव में खेती के लिए जमीन घटती जा रही थी। अतः बढ़ती जनसंख्या की मांग को छोटे खेतों द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता था, इसलिए किसान आय के अन्य साधन खोजने लगे।
  • ​पूर्व-औद्योगिकीकरण के समय व्यापार के नियमों को व्यापारी नियंत्रित करते थे और सामान का उत्पादन किसानों के द्वारा किया जाता था। अंतिम उत्पाद अनेक चरणों से गुजरता हुआ ब्रिटेन के बाजार में पहुँचता था, जहाँ से इन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भेजा जाता था।

​कारखानों की शुरुआत  :  ​इंग्लैंड में 1730 के दशक में कारखानों का निर्माण प्रारम्भ हुआ। ​18वीं सदी के अंत तक पूरे इंग्लैंड में कारखानों की स्थापना हुई। 1760 के दशक में ब्रिटेन में 25 लाख पाउंड का कपास आयात होता था, जो कि 1797 में बढ़कर 220 लाख पाउंड हो गया।

​कारखानों से लाभ:  ​बढ़े हुए कारखानों ने श्रमिकों की कार्य-कुशलता को बढ़ा दिया।  ​नई मशीनों की सहायता से एक श्रमिक अधिक मात्रा में बेहतर उत्पादन कर सकता था। यह औद्योगिकीकरण मुख्यतः सूती वस्त्र उद्योग में हुआ था।  ​श्रमिकों की निगरानी एवं उनसे काम लेना गाँवों की तुलना में कारखानों में अधिक आसान हो गया।

​औद्योगिक परिवर्तन की गति:  ​इस समय उद्योगों में होने वाला परिवर्तन मुख्यतः निम्न चार चरणों में सम्पन्न हुआ:

  1. ​ब्रिटेन में सूती वस्त्र एवं धातु उद्योग सबसे गतिशील उद्योग थे। औद्योगिकीकरण के पहले चरण में (1840 का दशक) सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ। रेलवे के प्रसार के बाद इस्पात उद्योग में भी वृद्धि हुई। 1873 तक आते-आते ब्रिटेन से लोहा-इस्पात के निर्यात की कीमत 7.7 करोड़ पाउंड हो गई, जो कि सूती वस्त्र उद्योग से दोगुनी थी।
  2. ​19वीं सदी के अंत तक उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या केवल 20% तक ही थी जो तकनीकी आधारित उद्योगों में काम करते थे। अतः ये नए उद्योग पारंपरिक उद्योग को विस्थापित नहीं कर पाए।
  3. ​सूती वस्त्र एवं धातु उद्योग भी पारंपरिक उद्योगों में बदलाव नहीं ला पाए, जबकि पारंपरिक उद्योगों में धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगा। इन उद्योगों में मुख्यतः खाद्यान्न प्रसंस्करण, भवन निर्माण, बर्तन निर्माण, काँच, चमड़ा उद्योग आदि को शामिल किया गया।
  4. ​नई तकनीक को लागू करने में अधिक वक्त लगा क्योंकि मशीनों की अधिक कीमत एवं महंगी मरम्मत के कारण व्यापारी व उद्योगपति इन मशीनों से दूर रहना चाहते थे। नई मशीनें उतनी विकसित नहीं थीं, जितना दावा किया जा रहा था।

​इतिहासकारों का मानना था कि 19वीं सदी के मध्य तक आम श्रमिकों को मशीनें चलानी नहीं आती थीं। अतः 1781 में जेम्स वॉट के द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार करके पेटेंट करवाया गया। 19वीं सदी में इंग्लैंड में 321 भाप इंजन थे, जिनमें से 80 सूती वस्त्र एवं ऊनी वस्त्र उद्योग में लगे हुए थे और शेष अन्य कार्यों से जुड़े हुए थे।

​मानव शक्ति और भाप की शक्ति:      ​इस समय मजदूरों की संख्या अधिक थी, अतः श्रमिकों से संबंधित कोई समस्या नहीं थी। इसलिए व्यापारी एवं उद्योगपति महंगी मशीनों में पूँजी लगाने की अपेक्षा श्रमिकों से काम लेना बेहतर समझते थे। मशीनों से बनी वस्तुएँ एक समान होती थीं, जो कि हाथ से बनी हुई वस्तुओं की गुणवत्ता एवं सुंदरता का मुकाबला नहीं कर सकती थीं। अतः उच्च वर्ग के लोग हाथ से बनी हुई वस्तुओं को अधिक पसंद करते थे।

​श्रमिकों का जीवन :    ​श्रमिक काम की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर जाने लगे। इन श्रमिकों को शहर में जान-पहचान के आधार पर नौकरी मिलती थी। जिनके कोई परिचित नहीं होते थे, उनके लिए काम पाना और कठिन हो गया। ​अनेक लोगों को महीनों तक काम नहीं मिलने के कारण पुलों के नीचे एवं रैन-बसेरों (Night Shelters) में निवास करना पड़ा। गरीबों के लिए बनी "पुअर लॉ अथॉरिटी" ऐसे लोगों के लिए ठहरने की व्यवस्था करने लगी। इन शहरों में कुछ महीने ही काम मिलता था, उसके बाद गरीब फिर से बेरोजगार हो जाते थे। ​19वीं सदी के आरम्भ में मजदूरों के जीवन पर कार्यों के नियोजन का प्रभाव पड़ता था। इस समय लगभग 10% जनसंख्या बहुत गरीब थी। आर्थिक मंदी के दौरान लगभग 15% से 35% जनसंख्या बेरोजगार हो गई। अतः अनेक लोगों ने नई तकनीक व मशीनों का विरोध किया। जैसे— जब नई मशीन 'स्पिनिंग जेनी' को लाया गया, तो महिलाओं ने इन मशीनों को तोड़कर विरोध किया। 1840 के दशक के बाद भवन निर्माण एवं यातायात क्षेत्र में विकास के कारण श्रमिकों की संख्या में लगभग 2 गुना वृद्धि हुई।

​भारत में कपड़ा उद्योग का युग:   18वीं सदी के मध्य तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना व्यापार विकसित कर लिया था। इस समय सूरत व हुगली जैसे पारंपरिक व्यापारिक केंद्रों का पतन हो चुका था, जबकि मुंबई (बॉम्बे) एवं कोलकाता (कलकत्ता) केंद्रों का विकास हुआ।  जब कंपनी ने राजनीतिक प्रभुता स्थापित कर ली, तो उन्होंने अपने व्यापारिक अधिकार जताना शुरू कर दिया। कंपनी ने अनेक कपड़ा व्यापारियों को समाप्त किया तथा बुनकरों पर सीधा नियंत्रण बनाने की कोशिश की। ​इस काम के लिए लोगों को वेतन पर रखा जाता था, जिन्हें 'गुमाश्ता' कहा जाता था। गुमाश्ता का काम बुनकरों के काम की निगरानी रखना, माल का संग्रहण करना एवं कपड़े की गुणवत्ता की जाँच करना था।

​             कंपनी यह कोशिश करती थी कि बुनकर किसी दूसरे ग्राहक के साथ व्यापारिक समझौता न करें, इसलिए अग्रिम भुगतान प्रणाली (Advance Payment System/ददनी प्रथा) विकसित की गई, जिसके तहत बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए कर्ज दिया जाता था।

​           जब कोई बुनकर कर्ज ले लेता था, तो वह किसी अन्य व्यापारी को माल नहीं बेच सकता था। कर्ज की इस नई व्यवस्था ने बुनकरों के लिए समस्या खड़ी कर दी, क्योंकि पहले वे अपने खेतों में परिवार के लिए अनाज बोया करते थे, लेकिन अब उनके पास समय न होने के कारण अपनी जमीन काश्तकारों (बटाईदारों) को देनी पड़ती थी।

​            पारंपरिक व्यापारियों के विपरीत गुमाश्ता बाहर का होता था, जिसके साथ कुछ सिपाही और चपरासी भी होते थे। वह समय पर काम पूरा न होने की स्थिति में बुनकरों को पीटते और सजा देते थे। इस व्यवस्था से बुनकर कर्ज के जाल में फँस गए। कर्नाटक एवं बंगाल में तो अनेक बुनकर गाँव छोड़कर चले गए, जबकि कुछ बुनकरों ने कर्ज लेने से मना कर दिया और पुनः खेती करने लग गए।

​मैनचेस्टर का भारत पर प्रभाव:      ​19वीं सदी के आरम्भ में भारतीय कपड़ों के निर्यात में कमी आने लगी। 1811-12 में भारत के कुल निर्यात में सूती वस्त्र का हिस्सा 33% था, जो 1850-51 में केवल 3% रह गया। ब्रिटेन के निर्माताओं के दबाव के कारण वहाँ की सरकार ने आयात कर (Import Duty) लगाया, ताकि ब्रिटेन के बाजारों में वहीं की वस्तुएँ बेची जाएँ। साथ ही कंपनी पर दबाव बनाया कि वह ब्रिटेन की वस्तुओं को भारत में बेचे। 1850 तक भारत में सूती वस्त्र का आयात 31% था, जो 1870 में बढ़कर 70% हो गया।  हाथ से बने हुए भारतीय सूती वस्त्र की तुलना में विदेशी सूती वस्त्र मशीनों से बना होने के कारण सस्ता था, अतः भारतीय उद्योग समाप्त होते गए।  ​1860 के दशक में अमेरिका में गृह युद्ध (Civil War) के कारण ब्रिटेन में कपास की कमी आई, अतः ब्रिटेन ने भारत से कच्चा कपास आयात करना शुरू कर दिया। इससे भारतीय बुनकरों के लिए कच्चे कपास की भारी कमी हो गई और कीमतें अत्यधिक बढ़ गईं।

​भारत में कारखानों की शुरुआत:   ​भारत में पहला सूती वस्त्र कारखाना 1854 में बंबई में खोला गया, जिसमें उत्पादन दो वर्ष बाद (1856 में) शुरू हुआ। 1862 तक वहाँ चार मिलें काम कर रही थीं।  ​इसी समय बंगाल में जूट मिलें खुलीं। कानपुर में 'एल्गिन मिल' खुली। अहमदाबाद में भी सूती वस्त्र निर्माण कार्य आरम्भ हुआ। मद्रास (चेन्नई) में सन 1874 में पहली बार कताई और बुनाई मिल खुली।  18वीं सदी के अंत से ही ब्रिटेन, भारत से चीन को अफीम का निर्यात करता था तथा वहाँ से चाय का आयात करता था, जिसमें अनेक भारतीय व्यापारियों ने हिस्सा लिया। इन व्यापारियों ने अधिक लाभ कमाने के बाद भारत में उद्योग स्थापित करने के सपने देखने शुरू किए। ​मुंबई में दिनशॉ पेटिट व जमशेदजी टाटा ने उद्योग स्थापित किए। कोलकाता में एक मारवाड़ी व्यवसायी सेठ हुकमचंद के द्वारा 1917 में पहली जूट मिल स्थापित की गई। अनेक व्यापारियों ने खाड़ी देशों एवं अफ्रीका के देशों के साथ व्यापार किया, लेकिन अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के कारण भारतीय उद्योग पूरी तरह स्वतंत्र रूप से सफल नहीं हो पा रहे थे। पहले विश्व युद्ध तक भारतीय उद्योगों पर यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों (जैसे बर्ड हेगलर्स एंड कंपनी) की पकड़ मजबूत थी।

​मजदूर कहाँ से आए?

             ​अधिकांश औद्योगिक क्षेत्रों के आस-पास के जिलों से मजदूर आसानी से मिल जाते थे। जैसे— मुंबई के मिलों के लिए रत्नागिरी जिले से लोग आते थे। ये मजदूर फसल कटाई व त्योहारों पर वापस गाँव लौट आते थे। कुछ समय बाद लोग काम की तलाश में अधिक दूरी तक भी जाने लगे, जैसे यू.पी. (संयुक्त प्रांत) के लोगों का मुंबई एवं कोलकाता की तरफ पलायन करना। लेकिन काम मिलना आसान नहीं था, क्योंकि उद्योगपति उन्हीं लोगों को काम देते थे जिनका कोई पुराना मजदूर जानकार हो। इसके लिए 'जॉबर' (Jobber) नामक कर्मचारी रखा जाता था। जॉबर कोई पुराना और विश्वसनीय मजदूर होता था। वह लोगों को गाँव से लाता था, उन्हें शहर में रहने की सुविधा देता था तथा मुसीबत में कर्ज भी देता था। यह जॉबर प्रभावशाली व्यक्ति बन जाता था, जो बाद में लोगों से रोजगार दिलाने के बदले पैसे एवं उपहार माँगने लगा तथा उनके जीवन में हस्तक्षेप भी करने लगा।

​औद्योगिक विकास का अनोखापन:   भारत में यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियां केवल विशेष उत्पादों (जैसे— चाय व कॉफी के बागान, खनन, नील और जूट व्यवसाय) में ही रुचि रखती थीं। 19वीं सदी के अंत तक भारतीय व्यापारी मैनचेस्टर में बनी महीन वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहते थे, इसलिए भारतीयों ने सूती मिलों में कपड़े के स्थान पर मोटा सूती धागा (Yarn) बनाना शुरू कर दिया। इस धागे का उपयोग भारतीय बुनकर करते थे या इसे चीन निर्यात किया जाता था। 20वीं सदी के पहले दशक में भारतीय उद्योगों में अनेक बदलाव आए। इस समय स्वदेशी आंदोलन के कारण औद्योगिक समूहों ने अपने हितों की रक्षा के लिए खुद को संगठित किया तथा आयात शुल्क बढ़ाने एवं अन्य रियायतों के लिए सरकार पर दबाव बनाया।

​           1906 के बाद चीन को होने वाले निर्यात में कमी आई क्योंकि चीन में जापान के उत्पादों में वृद्धि हो गई थी। अतः भारत के उद्योगपतियों ने धागे की बजाय पुनः कपड़ा बनाना शुरू कर दिया। 1900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।  

          प्रथम विश्व युद्ध तक उद्योगों का विकास धीमा रहा, लेकिन इस युद्ध ने एक नई स्थिति उत्पन्न कर दी। ब्रिटिश कारखाने सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए युद्ध संबंधी सामग्री के उत्पादन में लग गए। अतः भारत में मैनचेस्टर की वस्तुओं के आयात में भारी कमी आई। ​इसलिए भारतीय बाजार में देशी वस्तुओं की मांग बढ़ गई और भारतीय उद्योगों का तेजी से विकास हुआ। युद्ध के बाद भारतीय बाजार में मैनचेस्टर अपनी पुरानी स्थिति कभी वापस नहीं पा सका, क्योंकि ब्रिटिश उद्योग अमेरिका, जर्मनी व जापान की तुलना में कमजोर हो चुके थे और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी।

​लघु उद्योगों की बहुतायत :     ​यद्यपि युद्ध के बाद उद्योगों में वृद्धि हुई, लेकिन अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों का योगदान अभी भी कम था। 1911 में देश के 67% उद्योग केवल बंगाल एवं मुंबई में स्थित थे।  ​पंजीकृत कारखानों (Registered Factories) में काम करने वाले मजदूरों की संख्या कुल औद्योगिक श्रम शक्ति की 1911 में केवल 5% व 1931 में 10% थी। बाकी बहुतांश मजदूर छोटे व घरेलू कारखानों में काम करते थे।

​           20वीं सदी के दौरान हाथ से बने उत्पादों (हथकरघा उत्पादन) में वृद्धि हुई। इस समय बुनकरों ने हथकरघा उद्योगों में नई तकनीक अपनाई और पुराने करघों के स्थान पर 'फ्लाई शटल' (Fly Shuttle) वाले करघों का उपयोग शुरू किया। 1941 तक भारत के 30% से अधिक करघों में फ्लाई शटल लग चुके थे।

​वस्तुओं के लिए बाजार:      ​इस समय उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए एक नया तरीका विज्ञापन (Advertisement) था। विभिन्न उत्पादों को विज्ञापनों के द्वारा लोकप्रिय बनाया जाता था। ये विज्ञापन लोगों की सोच बदलकर नई जरूरतें पैदा करते थे।  जब मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने भारत में कपड़ा बेचना शुरू किया, तो वे कपड़ों के बंडल पर 'लेबल' लगाते थे। यह लेबल कंपनी का नाम व उत्पादक की जानकारी देता था। जब लेबल पर मोटे अक्षरों में "MADE IN MANCHESTER" लिखा दिखाई देता था, तो उपभोक्ताओं को वस्तु खरीदने में डर नहीं लगता था। ​इन लेबलों पर अक्षरों के साथ सुंदर तस्वीरें भी बनी होती थीं, जिनमें भारतीय देवी-देवताओं (जैसे— कृष्ण, सरस्वती, लक्ष्मी) की तस्वीरें शामिल थीं। इन तस्वीरों के माध्यम से निर्माता यह दिखाना चाहते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि आप उस वस्तु को खरीदें। साथ ही इन तस्वीरों के कारण विदेशों में बनी वस्तुएँ भी भारतीयों को जानी-पहचानी लगती थीं।

​                19वीं सदी के अंत में निर्माता अपने उत्पादों को बेचने के लिए कैलेंडर छपवाने लगे, क्योंकि भारत में अनपढ़ लोग भी कैलेंडरों को देख और समझ सकते थे। इन कैलेंडरों पर भी देवी-देवताओं, महत्वपूर्ण व्यक्तियों और राजाओं की तस्वीरें होती थीं। ये कैलेंडर चाय की दुकानों, कार्यालयों और घरों आदि स्थानों पर लटकाए जाते थे।

​            जब भारतीय व्यवसायियों ने विज्ञापन बनाए, तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ दिखाई देता था। इसका अर्थ यह होता था कि "अगर आप राष्ट्र की भावना रखते हैं, तो उन्हीं वस्तुओं को खरीदें जो भारत में बनी हैं" (अर्थात स्वदेशी अपनाएँ)।

​महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्द

​प्राच्य (Orient): भूमध्य सागर के पूर्व में स्थित देशों को, विशेष रूप से एशिया के देशों को 'प्राच्य' कहा जाता था। यह पश्चिमी दृष्टिकोण को दर्शाता है जो इस क्षेत्र को पारंपरिक और रहस्यमयी मानता था।

​स्टेपलर (Stapler): ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को 'स्टेपल' करता है यानी उसे छाँटता है।

​फुलर्स (Fuller): ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से कपड़ों को 'फुल' करता है, अर्थात चुन्नटों के सहारे कपड़े को समेटता या इकट्ठा करता है।

​कार्डिंग (Carding): वह प्रक्रिया जिसमें ऊन या कपास आदि रेशों को कताई (Spinning) के लिए तैयार किया जाता है।

​स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny): जेम्स हरग्रीव्ज द्वारा 1764 ई. में बनाई गई कताई की मशीन, जो कताई के कार्य को तेजी से करती थी। इसमें एक ही पहिया घुमाने पर एक साथ अनेक धागे बनाए जा सकते थे।

​जॉबर (Jobber): इन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में सरदार, मिस्त्री आदि नामों से जाना जाता था। इनका मुख्य कार्य मिलों के लिए नए मजदूरों को रोजगार दिलाना और उनकी मदद करना था।

​फ्लाई शटल (Fly Shuttle): यह रस्सी और पुलियों के सहारे चलने वाला एक यांत्रिक औजार है, जिसका उपयोग बुनाई के लिए किया जाता था। यह क्षैतिज धागे (ताना) को लंबवत धागे (बाना) में बदलता है, जिससे बड़े अरज का कपड़ा बुनना आसान हो गया।

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