अध्याय-1 सत्ता की साझेदारी
सत्ता की साझेदारी का अर्थ:- सत्ता या शासन का बँटवारा सत्ता की साझेदारी कहलाता है। अर्थात सत्ता में सभी लोगों की भागीदारी को ही सत्ता की साझेदारी कहते हैं। इसमें सभी शक्तियाँ सरकार के विभिन्न अंगों में बँटी हुई होती हैं। विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में सत्ता की साझेदारी देखने को मिलती है।
सत्ता की साझेदारी क्यों जरूरी है?:- सत्ता की साझेदारी के पक्ष को हम निम्न तर्क के द्वारा समझ सकते हैं:-
सत्ता का बँटवारा ठीक तरह से हो:- विभिन्न समुदायों के बीच टकराव, तनाव, झगड़ा न हो इसलिए सत्ता का बँटवारा आवश्यक है। देश की राजनैतिक व्यवस्था के स्थायित्व के लिए सत्ता में सभी समुदायों के लोगों की भागीदारी अति आवश्यक है।
सत्ता का बँटवारा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक है:- सत्ता का बँटवारा लोकतंत्र के लिए अच्छा होता है, क्योंकि वैध शासन वही है, जिसमें लोग अपनी भागीदारी के माध्यम से शासन से जुड़ते हैं। इसलिए सत्ता की साझेदारी को लोकतंत्र की आत्मा कहा जाता है।
सत्ता की साझेदारी के रूप:- वर्तमान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता की साझेदारी के अनेक रूप हो सकते हैं, जो निम्न हैं:-
शासन के विभिन्न अंगों में बँटवारा:- सरकार का बँटवारा मुख्यतः तीन अंगों में पाया जाता है। जिन्हें कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका कहा जाता है। ये तीनों अंग अपनी-अपनी शक्तियों का स्वतंत्र रूप से उपयोग करते हैं। व्यवस्थापिका का कार्य कानून बनाना, कार्यपालिका का कार्य कानून को लागू करना तथा न्यायपालिका का कार्य कानून की जाँच करना व न्याय करना होता है। न्यायपालिका, व्यवस्थापिका व कार्यपालिका द्वारा बनाए गए कानूनों पर नियंत्रण रखती है। जिसे नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धांत कहते हैं।
सरकार के विभिन्न स्तरों में सत्ता का बँटवारा:- लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के विभिन्न स्तर पाए जाते हैं। सम्पूर्ण देश के शासन के लिए केन्द्र सरकार तथा प्रांतों की सरकार को राज्य सरकार कहा जाता है। भारत में शासन का तीसरा स्तर भी जोड़ा गया है, जिसे स्थानीय शासन कहा जाता है। स्थानीय शासन में नगरपालिका व ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया है। उच्च एवं निम्न स्तर की सरकार के बीच सत्ता के बँटवारे को सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है।
विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा:- कुछ देशों में कमजोर समुदाय एवं महिलाओं को सत्ता में हिस्सेदारी दी जाती है, ताकि वह स्वयं को शासन से अलग न समझें। जैसे:- बेल्जियम की सरकार।
राजनैतिक दलों व दबाव समूहों के द्वारा सत्ता का बँटवारा:- लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग विचारधारा एवं सामाजिक समूहों वाली पार्टियों के हाथ में सत्ता रहती है, अतः यह राजनैतिक दल सत्ता का बँटवारा कर लेते हैं।
बेल्जियम में सत्ता की साझेदारी:- बेल्जियम यूरोप में स्थित हरियाणा से भी छोटा देश है। बेल्जियम की सीमाएँ फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड तथा लक्ज़मबर्ग से लगती हैं। जिसकी कुल जनसंख्या लगभग 1 करोड़ है। बेल्जियम की जातीय बनावट कठिन है। यहाँ की 59% जनसंख्या फ्लेमिश क्षेत्र में निवास करती है, तथा डच भाषा बोलती है। बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में 80% जनसंख्या फ्रेंच एवं 20% जनसंख्या डच भाषा बोलती है। जबकि 40% जनसंख्या वेलोनिया में निवास करती है, एवं फ्रेंच भाषा बोलती है। शेष 1% जनसंख्या जर्मन भाषा बोलती है।
फ्रेंच भाषा बोलने वाले अल्पसंख्यक (कम) लोग समृद्ध (धनी) एवं ताकतवर हैं, जबकि डच लोग बहुसंख्यक (ज्यादा) थे। अतः 1950 से 1960 के बीच फ्रेंच व डच भाषा बोलने वालों के बीच तनाव बढ़ गया जो कि बेल्जियम की बड़ी समस्या थी। बेल्जियम में डच भाषी लोग अपनी संख्या के बल पर फ्रेंच व जर्मन भाषी लोगों पर अपनी इच्छाएँ थोप सकते थे। लेकिन उन्होंने सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार किया।
बेल्जियम की समझदारी:- बेल्जियम के नेताओं ने क्षेत्रीय विभिन्नता एवं सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार किया। बेल्जियम में लोगों को बेगानेपन का अहसास न हो तथा सभी मिल-जुलकर रहें इसलिए बेल्जियम के संविधान में 1970 से 1993 के बीच चार बार संविधान में संशोधन किए गए।
बेल्जियम के मॉडल (संविधान) की विशेषताएँ:-
बेल्जियम की केंद्रीय सरकार में डच एवं फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान रहेगी।
कुछ विशेष कानून तभी बनेंगे जब दोनों भाषायी समूह के सांसदों का बहुमत होगा। अर्थात एक समुदाय के लोग फैसला नहीं कर सकते।
* राज्य सरकार केन्द्र सरकार के अधीन नहीं होगी।
* ब्रुसेल्स में अलग सरकार है, जिसमें दोनों समुदायों का समान प्रतिनिधित्व होगा।
* सरकार के तीसरे स्तर में 'सामुदायिक सरकार' बनायी गयी जिसका चुनाव एक ही भाषा बोलने वाले करते थे। इसे संस्कृति, शिक्षा एवं भाषा पर फैसले लेने का अधिकार दिया गया।
बेल्जियम के इस मॉडल से गृहयुद्ध की आशंका पर विराम लग गया। अतः बेल्जियम (ब्रुसेल्स) को यूरोपीय संघ का मुख्यालय चुना गया।
श्रीलंका में सत्ता की साझेदारी:- श्रीलंका तमिलनाडु के दक्षिण में स्थित एक द्वीपीय देश है। जिसकी जनसंख्या लगभग 2 करोड़ है। यहाँ अनेक जातीय समूह के लोग रहते हैं। श्रीलंका की 74% जनसंख्या सिंहली समूह की है, जबकि 18% तमिल समूह की जनसंख्या है। तमिल जनसंख्या दो समूहों में विभाजित है:-
श्रीलंका के मूल तमिल (13%)
भारतीय तमिल (5%)
हिन्दुस्तानी (भारतीय) तमिल औपनिवेशिक काल में बागानों में काम करने के लिए भारत से लाए गए लोगों की संतान हैं। अधिकांश तमिल श्रीलंका के उत्तर-पूर्वी प्रांत में निवास करते हैं। सिंहली भाषियों का धर्म बौद्ध है, जबकि तमिल भाषी हिन्दू एवं कुछ मुस्लिम हैं। इनके अलावा श्रीलंका में 7% जनसंख्या ईसाई है।
श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद:- 1948 में श्रीलंका की आजादी के समय सिंहली भाषी लोगों ने अपनी संख्या के बल पर शासन पर प्रभुत्व जमाना चाहा। अतः लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार ने सिंहली समुदाय की प्रभुता कायम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए:- सन् 1956 में एक कानून बनाकर सिंहली को श्रीलंका की राजभाषा घोषित किया गया तथा सभी विश्वविद्यालयों व सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी गई। नए संविधान में बौद्ध धर्म को संरक्षण देने का प्रावधान किया गया।
इन फैसलों ने तमिलों की नाराजगी बढ़ाई। उन्हें लगा कि संविधान एवं सरकारी नीतियां उन्हें राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर रही हैं। नौकरी एवं अन्य कार्यों में भेदभाव एवं उनके हितों की अनदेखी (उपेक्षा) की जा रही है।
अतः तमिल एवं सिंहली लोगों के संबंध बिगड़ते चले गए तथा तमिलों ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनायी एवं तमिल को राजभाषा बनाने, शिक्षा व रोजगार में समान अवसर पाने के लिए संघर्ष किया।
1980 के दशक में उत्तर-पूर्वी श्रीलंका में स्वतंत्र (तमिल ईलम) सरकार बनाने के लिए राजनीतिक संगठन बनाए गए। जिससे दोनों समुदायों में आपसी टकराव के कारण हजारों लोग मारे गए एवं कुछ परिवार श्रीलंका छोड़कर भाग गए। अंत में यह गृहयुद्ध 2009 में समाप्त हुआ।
बेल्जियम व श्रीलंका विद्रोह का परिणाम (शिक्षा):- दोनों लोकतांत्रिक देशों ने सत्ता की साझेदारी को अलग तरीके से पेश किया है।
बेल्जियम को लगा कि विभिन्न समुदायों की भावनाओं का आदर करने पर ही देश की एकता संभव है। अतः दोनों पक्ष साझेदारी के लिए सहमत हो गए।
जबकि श्रीलंका में बेल्जियम के ठीक विपरीत, बहुसंख्यक समुदाय दूसरों पर प्रभुत्व कायम करने एवं सत्ता में साझेदारी न बनाने का फैसला करता है, जिससे देश की एकता संकट में पड़ गयी।
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