अध्याय-1 जनसंख्या वितरण, घनत्व, वृद्धि और संगठन
जनसंख्या किसी भी देश का महत्वपूर्ण घटक होता है।
भारत विश्व में 121 करोड़ जनसंख्या के साथ चीन के बाद दूसरे स्थान पर है।
भारत की जनसंख्या उ. अमेरिका, द. अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी अधिक है।
भारत में सर्वप्रथम जनगणना 1872 में हुई थी लेकिन सम्पूर्ण देश की व्यवस्थित जनगणना 1881 में सम्पन्न हुई थी। इसके बाद प्रत्येक 10 वर्ष से भारत में जनगणना की जाती है। लेकिन Covid-19 के कारण 2021 में जनगणना नहीं हुई।
जनसंख्या का वितरण
भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है। देश में सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य U.P. (प्रथम), महाराष्ट्र, बिहार व प. बंगाल हैं। भारत की 76% जनसंख्या देश के केवल 10 राज्यों UP, बिहार, महाराष्ट्र, प. बंगाल, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, MP, RJ, कर्नाटक व उ.प्र. में निवास करती है। जबकि J&K में (1.04%), अरुणाचल (0.84%), उत्तराखण्ड (0.83%) में जनसंख्या कम निवास करती है।
जनसंख्या का यह असमान वितरण देश की जनसंख्या व भौतिक, सामाजिक, आर्थिक व ऐतिहासिक कारकों के बीच सम्बन्ध प्रकट करता है। भारत में मैदानों, तटीय क्षेत्रों में व डेल्टाई क्षेत्रों में जनसंख्या अधिक निवास करती है। जबकि दक्षिण का पठार, पर्वतीय क्षेत्र व मरुस्थलीय क्षेत्रों में जनसंख्या कम निवास करती है।
जनसंख्या के इस असमान वितरण को जलवायु, धरातल, जलापूर्ति, खनिज, परिवहन, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक कारक प्रभावित करते हैं। जबकि महानगरों में उद्योग व नगरीकरण के कारण जनसंख्या अधिक निवास करती है।
जनसंख्या घनत्व
भूमि की प्रत्येक इकाई क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों की संख्या को जनसंख्या घनत्व कहते हैं। 1951 में भारत का जनघनत्व 117 व्यक्ति/km² था, जो कि 2011 में बढ़कर 382 व्यक्ति/km² हो गया। देश में सर्वाधिक जन घनत्व वाले राज्य बिहार (1102), प. बंगाल (1029), UP (829) हैं। जबकि न्यूनतम घनत्व वाले राज्य अरुणाचल (17), मिजोरम (52) व सिक्किम (86) हैं।
जबकि सर्वाधिक जन घनत्व वाले केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली (11297), चण्डीगढ़ (9258) हैं। तथा न्यूनतम जन घनत्व वाला केन्द्र शासित प्रदेश अण्डमान निकोबार द्वीप समूह (46) है।
जनसंख्या घनत्व = कुल जनसंख्या ÷ कुल क्षेत्रफल
कायिक घनत्व: इसे कृषि क्षेत्रीय घनत्व भी कहते हैं। इसमें कुल कृषि भूमि व उस पर निवास करने वाले लोगों की जन. का अनुपात ज्ञात किया जाता है।
कयिक घनत्व = कुल जनसंख्या ÷निवल बोया गया क्षेत्र
कृषि घनत्व: इसमें कृषि भूमि का क्षेत्रफल व उस पर निवास करने वाले कृषक जन. का अनुपात ज्ञात किया जाता है।
कृषि घनत्व = कुल कृषक जनसंख्या ÷ निवल बोया गया क्षेत्र
जनसंख्या वृद्धि
दो समय बिन्दुओं के मध्य किसी क्षेत्र विशेष में निवास करने वाले व्यक्तियों की संख्या में होने वाले परिवर्तन को जन. वृद्धि कहते हैं। जन. वृद्धि की दर को प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।
जन. वृद्धि के घटक: दो - (1) प्राकृतिक घटक, (2) अभिप्रेरित घटक
प्राकृतिक वृद्धि का विश्लेषण अशोधित जन्म व मृत्युदर के द्वारा निर्धारित होता है। जबकि अभिप्रेरित वृद्धि को दिए गए क्षेत्र में लोगों के अंतरवर्ती व बहिवर्ती संचलन के द्वारा स्पष्ट किया जाता है।
Note: भारत की वास्तविक वार्षिक वृद्धि दर = 1.64%
दशकीय वृद्धि दर: 17.64%
जनसंख्या के दो गुना होने का समय:
वर्तमान वार्षिक वृद्धि दर पर किसी भी जनसंख्या के दो गुणा होने में लगने वाले समय को जन. के दो गुणा होने का समय कहलाता है।
जनसंख्या की प्रावस्था (चार):
प्रथम अवस्था (1901-1921 तक): सन् 1901 से 1921 की अवधि को भारत की जन. वृद्धि की स्थिर अवस्था कहा जाता है, क्योंकि इस समय वृद्धि दर निम्न थी। 1911 से 1921 के दौरान कुछ क्षेत्रों में ऋणात्मक वृद्धि भी दर्ज की गई। इस समय जन्म व मृत्यु दर दोनों ही उच्च रहे जिसका प्रमुख कारण निम्न स्वास्थ्य दशा, निम्न साक्षरता दर, भोजन व मूलभूत आवश्यकताओं में कमी आदि है जिसके कारण वृद्धि दर निम्न रही।
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द्वितीय अवस्था (1921-1951 तक): इस अवधि को जनसंख्या की स्थिर वृद्धि की अवधि के रूप में जाना जाता है। इस समय भारत में स्वास्थ्य व स्वच्छता में सुधार, परिवहन, व्यापार व संचार सुविधाओं में विकास हुआ। जिससे अशोधित जन्मदर उच्च बनी रही।
तृतीय अवस्था (1951-1981 तक): 1951 से 1981 के दशकों को भारत में जनसंख्या विस्फोट की अवधि माना जाता है। इस समय उच्च जन्मदर व निम्न मृत्युदर रही। इस काल में वार्षिक वृद्धि दर 2.2% थी। आजादी के बाद केन्द्रीय नियोजन के कारण विकास अधिक हुआ। अर्थव्यवस्था में सुधार के कारण लोगों की जीवन शैली में सुधार हुआ, जिससे वृद्धि दर उच्च रही। तथा तिब्बत, नेपाल, बांग्लादेश व पाकि. से आने वाले प्रवासियों ने भी जन. में वृद्धि की है।
चतुर्थ प्रावस्था (1981 से वर्तमान तक): 1981 के बाद देश की जन. में मन्द गति से वृद्धि हुई, जिसके लिए अशोधित जन्मदर उत्तरदायी है। इस निम्न वृद्धि के लिए विवाह की आयु, जीवन की गुणवत्ता, महिला शिक्षा, परिवार नियोजन कार्यक्रम आदि ने प्रभावित किया है।
Note: विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2025 तक जन. 135 करोड़ हो जाएगी।
जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय विभिन्नता:
1991 से 2001 तक भारत के विभिन्न राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में होने वाली जनसंख्या वृद्धि दर स्पष्ट रूप दर्शाती है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश व उड़ीसा जैसे राज्यों में निम्न वृद्धि दर पायी जाती है। केरल में सबसे कम वृद्धि दर (9.4%) पायी जाती है। उत्तरी राज्यों में उच्च दर पायी जाती है जिनमें गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, UP, MP, बिहार, बंगाल, झारखण्ड आदि राज्यों में 20% से 25% तक वृद्धि दर रही है।
जबकि 2001 से 2011 तक सभी संघ क्षेत्रों में पिछले दशक की तुलना में वृद्धि दर कम रही है। आन्ध्र प्रदेश में सबसे कम 3.5% तथा महाराष्ट्र में सर्वाधिक 6.7% की कमी आई है। जबकि तमिलनाडु में (3.9%) व पाण्डिचेरी में (7.1%) में पिछले दशक की तुलना में 2001 से 2011 में वृद्धि दर्ज की गई।
भारत में जनसंख्या वृद्धि का महत्वपूर्ण पक्ष किशोरों की संख्या में वृद्धि है। वर्तमान में किशोरों (10-19 वर्ष) का कुल जन. में % भाग अधिक है। किशोर जन. उच्च सम्भावनाओं से अमृत युवा जन. समझी जाती है। यदि उन्हें उचित मार्गदर्शन नहीं दिया जाये तो समाज को अधिक हानि होती है जो कि एक बड़ी चुनौती है। जैसे- विवाह की कम आयु, निरक्षरता, स्त्री शिक्षा का अभाव, विद्यालय विरत छात्र, अल्प पोषणता, कम उम्र में मातृत्व भार के कारण मृत्यु, HIV जैसे संक्रमण, शारीरिक व मानसिक अपंगता, नशे की प्रवृति, किशोर अपराध आदि बढ़ रहे हैं।
इन सभी समस्याओं के समाधान हेतु सरकार के द्वारा राष्ट्रीय युवा नीति अपनायी गई है। यह नीति (NYP 2014) फरवरी 2014 में आरम्भ की गई।
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इस नीति का उद्देश्य युवाओं को अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग करने के लिए सक्षम बनाना व विश्व स्तर पर देश की नयी पहचान बनाना है।
Note: राष्ट्रीय युवा नीति 2014 के द्वारा 15 से 29 वर्ष की जन. को युवा शब्द से परिभाषित किया गया है।
जनसंख्या संघटन
जनसंख्या का वह प्रारूप जिसमें आयु, लिंग, साक्षरता, ग्रामीण-नगरीय जन संरचना के आधार पर जन. को पृथक कर अध्ययन करना जन. संघटन कहलाता है।
ग्रामीण-नगरीय संघटन
निवास स्थान के अनुसार जन. का यह वर्ग सामाजिक, आर्थिक विशेषताओं को दर्शाता है। 2011 के अनुसार देश में कुल गाँव 6,40,867 में से 5,97,608 गाँवों में देश की लगभग 68.8% जन. निवास करती है। सिक्किम व बिहार में ग्रामीण जन. अधिक है, जबकि दादरा नगर हवेली को छोड़कर सभी संघ शासित क्षेत्रों में न्यूनतम ग्रामीण जन. पाई जाती है।
सभी राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों में नगरीय जन. बढ़ी है, जो सामाजिक आर्थिक दशाओं के सन्दर्भ में नगर के विकास व प्रवास की बढ़ी हुई दर को प्रदर्शित करती है। उत्तर भारत में सड़कों के मिलन बिन्दु, रेलवे लाइनों के किनारों पर नगरों में ग्रामीण-नगरीय प्रवास स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।
कृषि की दृष्टि से मध्य एवं निम्न गंगा के मैदान, तेलंगाना, मरुस्थलीय क्षेत्र, पहाड़ी क्षेत्र, जनजाति क्षेत्र व बाढ़ संभावित क्षेत्रों में नगरीकरण का स्तर निम्न पाया जाता है।
भाषाई संघटन
भारत एक भाषाई विविधता वाला देश है। भाषाई सर्वेक्षण विभाग के अध्यक्ष ग्रियर्सन के अनुसार भारत में 179 भाषाएँ एवं 544 के लगभग बोलियाँ हैं। भारत के संविधान में भी 22 भाषाएँ अनुसूचित हैं जिनमें सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी है, जबकि संस्कृत, बोडो व मणिपुरी भाषा बोलने वालों का प्रतिशत बहुत कम है। भारत में भाषा प्रदेशों की सीमाएँ निश्चित नहीं हैं, बल्कि विभिन्न प्रदेशों में भाषा का क्रमिक विलय व अध्यारोपण हो जाता है।
भाषाई वर्गीकरण
प्रमुख भारतीय भाषाओं को बोलने वाले 4 भाषा परिवारों से जुड़े हुए हैं, जिनके उपपरिवार, शाखा, वर्ग व भाषा क्षेत्र निम्न हैं:
धार्मिक संघटन:
धर्म के आधार पर जन. को वर्गीकृत करते हुए अध्ययन करना धार्मिक संघटन कहलाता है। धर्म देश के लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक है। क्योंकि धर्म लोगों के परिवार व सामाजिक जीवन के सभी पक्षों में व्याप्त होता है। देश का धार्मिक स्थानिक वितरण प्रदर्शित करता है कि कुछ राज्यों व जिलों में एक धर्म की संख्या अधिक है जबकि अन्य राज्यों में उस धर्म की जन. कम है।
भारत-बांग्लादेश व भारत-पाकिस्तान सीमा से जुड़े जिलों, J&K, उ. पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र, पठार व गंगा के मैदान को छोड़कर हिन्दू जन. अनेक राज्यों में समूह के रूप में वितरित है जो कि 70 से 90% तक है।
धार्मिक अल्पसंख्यक मुस्लिम - बंगाल, केरल, UP, दिल्ली व लक्षद्वीप में बसे हैं। जबकि ईसाई जन. ग्रामीण क्षेत्रों में गोवा, केरल, मेघालय, मिजोरम, छोटा नागपुर पठार, नागालैण्ड की पहाड़ी व मणिपुर में बसे हैं।
देश में हिन्दू जन. 79.8%, मुस्लिम 14.2%, ईसाई 2.3%, सिख 1.7%, बौद्ध 0.7%, जैन 0.4% व अन्य 0.7% जन. निवास करती है।
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सिख धर्म के अनुयायी पंजाब, HR व दिल्ली में निवास करते हैं। जैन धर्म का प्रमुख केन्द्र राज., गुजरात व म.प्र. तथा बौद्ध धर्म का मुख्य केन्द्र महाराष्ट्र, सिक्किम, अरुणाचल, लद्दाख व त्रिपुरा है।
धर्म व भू-दृश्य:
भू-दृश्य पर अभिव्यक्ति पवित्र संरचना, कब्र, पेड़-पौधे, धार्मिक उद्देश्य के केन्द्र, वृक्ष-निकुंज आदि के माध्यम से प्रकट होती है। पवित्र संरचना संपूर्ण देश में व्यापक रूप से वितरित है। यह गांवों में छोटे मन्दिर से लेकर विशाल मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर आदि के रूप में होती है। जो किसी क्षेत्र के भू-दृश्य को विशेष रूप देते हुए मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, मठ आदि के आकार-प्रकार, स्थान, प्रथा व संख्या में विभिन्नता को प्रदर्शित करती है।
श्रमजीवी जनसंख्या का संघटन
आर्थिक दृष्टि से भारतीय जन. को तीन भागों में बाँटा गया है:
मुख्य श्रमिक: वह श्रमिक जो एक वर्ष में कम से कम 183 दिन (6 माह) कार्य करता है उसे मुख्य श्रमिक कहते हैं।
सीमान्त श्रमिक: वह श्रमिक जो एक वर्ष में 183 दिनों से कम दिनों तक कार्य करता है उसे सीमान्त श्रमिक कहते हैं।
अश्रमिक: ऐसे व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की आर्थिक क्रिया से जुड़े हुए न हों उन्हें अश्रमिक कहते हैं।
भारत में 2011 के अनुसार 39.8% जन. श्रमिकों की है। जबकि 60.2% जन. अश्रमिकों की है। अर्थात जन. का बड़ा भाग अश्रमिकों का है। देश में श्रमजीवी जन. का अनुपात गोवा में 39.6% व दमन-दीव में 49.9% है। हिमाचल, छत्तीसगढ़, सिक्किम, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, अरुणाचल, नागालैण्ड, मणिपुर व मेघालय तथा दादरा नगर हवेली व दमन-दीव की दर उच्च है।
भारत की श्रमजीवी जनसंख्या का 54.6% भाग कृषक व कृषि मजदूर का है, जबकि 3.8% भाग घरेलू उद्योगों में व 41.6% भाग अन्य व्यवसाय से जुड़ा है। हिमाचल व नागालैण्ड में कृषक जन., बिहार, बंगाल, आन्ध्र प्रदेश व MP में कृषक मजदूर अधिक हैं। जबकि महानगरों में सेवा व्यवसाय से जुड़ी जन. अधिक है।
व्यावसायिक संवर्ग: 2011 की जनगणना के अनुसार श्रमजीवी जन. को 4 संवर्गों में विभाजित किया गया है:
कृषक
कृषक मजदूर
घरेलू औद्योगिक श्रमिक
अन्य श्रमिक

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