खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

 ​पाठ - 5: खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

​भू-पर्पटी: पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत भू-पर्पटी कहलाती है। जिसका निर्माण खनिजों के योग से होता है।

​खनिज एवं मंजन से एक उज्ज्वल मुस्कान: दंत मंजन दाँतों को साफ रखता है। फ्लोराइड दाँतों को गलने से रोकता है। अधिकांश दंत मंजन टिटेनियम डाइऑक्साइड से सफेद बनाए जाते हैं, जो र्यूटाइल, इल्मेनाइट तथा एनाटेज़ खनिजों से प्राप्त होता है। अभ्रक दंत मंजन को चमकाता है। जबकि टूथब्रश व टूथपेस्ट की ट्यूब पेट्रोलियम पदार्थों से बनी होती है।

​खनिज: भू-गर्भ से खोदकर निकाले गए पदार्थों को खनिज कहते हैं।

​खनिजों को खोदने की क्रिया खनन कहलाती है।

​वह स्थान जहाँ से खनिज पदार्थों को खोदकर निकाला जाता है, उसे खान या खदान कहा जाता है।

​खनिजों का निर्माण तत्वों वाले भौतिक एवं रासायनिक गुणों का परिणाम है।

​अब तक लगभग 2000 प्रकार के खनिजों को ही काम में लिया जाता है। खनिजों को उनके रंग व गुणों के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया जाता है:

​धात्विक खनिज: ऐसे खनिज जिनमें धातु का अंश पाया जाए, उन्हें धात्विक खनिज कहते हैं। धात्विक खनिज लोहा की मात्रा के आधार पर दो प्रकार के होते हैं:

​(i) लौह धात्विक खनिज: ऐसे खनिज जिनमें लोहांश की मात्रा पाई जाती है। जैसे: लोहा, कोबाल्ट, निकिल, मैंगनीज।

​(ii) अलौह धात्विक खनिज: ऐसे खनिज जिनमें लोहांश की मात्रा नहीं पाई जाती है। जैसे: सोना, चाँदी, ताँबा, प्लैटिनम, एल्युमीनियम।

​अधात्विक खनिज: ऐसे खनिज जिनमें धातु का अंश नहीं पाया जाता है, उन्हें अधात्विक खनिज कहते हैं। जैसे: नमक, अभ्रक, चूना पत्थर, संगमरमर, पोटाश, बलुआ।

​ईंधन खनिज / ऊर्जा खनिज: ऐसे खनिज जिनका उपयोग ऊर्जा उत्पादन या ईंधन के रूप में किया जाता है। जैसे: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, थोरियम आदि।

​खनिजों की उपलब्धता

​खनिज सामान्यतः अयस्क रूप में पाए जाते हैं। तत्वों के मिश्रण को अयस्क कहते हैं। सामान्यतः खनिज पदार्थ निम्न शैल समूहों में पाए जाते हैं:

​आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों में: खनिज दरार, जोड़ों व सिराओं में पाए जाते हैं। सामान्यतः इनका जमाव सिराओं या परतों के रूप में पाया जाता है। मुख्यतः धात्विक खनिज जैसे: जस्ता, ताँबा, जिंक आदि।

​अवसादी चट्टानों में: अनेक खनिज परत के रूप में पाए जाते हैं। इनका जमाव क्षैतिज (लैटिज) रूप में होता है। जैसे: कोयला एवं लौह खनिजों का जमाव।

​चट्टानों के घुलनशील पदार्थों के अपरदन के बाद: शेष बची चट्टान में बॉक्साइट का निर्माण होता है।

​जलोढ़ मृदा में: जलोढ़ मृदा में भी खनिज पाए जाते हैं जिन्हें प्लेसर निक्षेप कहा जाता है। यह खनिज जल के द्वारा अपरदित नहीं होते हैं। जैसे: सोना, चाँदी, टिन।

​महासागरीय जल में: महासागरीय जल में खनिजों के विशाल भंडार हैं। जैसे: नमक, मैग्नीशियम, ब्रोमाइन आदि। महासागरों में मैंगनीज ग्रंथियों के भंडार अधिक पाए जाते हैं।

​रैट होल खनन (Rat Hole Mining)

​भारत में खनन कार्य सरकार की अनुमति से ही किया जाता है, लेकिन उत्तर-पूर्वी भारत में जनजातीय क्षेत्रों में खनिजों का स्वामित्व व्यक्तिगत या समुदाय को प्राप्त है। मेघालय में कोयला, लौह अयस्क, चूना पत्थर आदि के भंडार हैं। अतः चेरापूंजी एवं जोवाई में परिवार के सदस्यों द्वारा एक लंबी सुरंग के रूप में कोयले का खनन किया जाता है, जिसे रैट होल खनन कहा जाता है। इस खनन को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने गैर-कानूनी घोषित किया है।

​खनिजों का वितरण

​भारत में खनिजों का वितरण असमान है। प्रायद्वीपीय भारत में कोयला, अभ्रक एवं धात्विक खनिजों के भंडार पाए जाते हैं, जबकि गुजरात एवं असम में पेट्रोलियम के भंडार अधिक हैं। राजस्थान में अलौह खनिजों के भंडार अधिक पाए जाते हैं। अयस्क में खनिजों का साधारण खनन, खनन की सरलता एवं बाजार की समीपता से अधिक प्रभावित होता है।

​लौह अयस्क खनिज

​धात्विक खनिजों के कुल उत्पादन मूल्य का 3/4 भाग लौह अयस्क का है। लौह धातु सभी उद्योगों को आधार प्रदान करती है। अतः इसे आधारभूत उद्योग, मूलभूत उद्योग तथा सभी उद्योगों की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है।

​भारत में लौह अयस्क के विशाल भंडार पाए जाते हैं। यहाँ उच्च गुणवत्ता वाले अयस्क का उत्पादन किया जाता है।

​मैग्नेटाइट: यह सर्वोत्तम अयस्क है, जिसमें 70% तक लोहांश की मात्रा पाई जाती है। इसमें चुंबकीय गुण पाए जाते हैं। इसका उपयोग विद्युत उद्योगों में किया जाता है।

​हेमेटाइट: यह दूसरा महत्वपूर्ण अयस्क है, जिसमें 60% लोहांश की मात्रा पाई जाती है। यह सर्वाधिक उपयोग में लिया जाने वाला अयस्क है।

​भारत में लौह अयस्क का उत्पादन मुख्यतः ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक एवं झारखंड आदि राज्यों में किया जाता है।

​प्रमुख लौह अयस्क पेटियाँ

​ओडिशा - झारखंड खनिज पेटी: इस पेटी में हेमेटाइट किस्म के लोहे का उत्पादन किया जाता है। ओडिशा राज्य के मयूरभंज एवं केंदुझर जिले में बादाम पहाड़ से लौह अयस्क का उत्पादन होता है। जबकि झारखंड राज्य में सिंहभूम जिले की गुआ व नोवामुंडी क्षेत्र से खनिज का उत्पादन किया जाता है।

​दुर्ग - बस्तर - चंद्रपुर पेटी: यह पेटी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र राज्य में फैली हुई है। इस पेटी में बस्तर जिले की बैलाडिला की पहाड़ी से बैलाडिला खान से अयस्क का उत्पादन किया जाता है। यहाँ से उत्पादित अयस्क को विशाखापट्टनम बंदरगाह के द्वारा दक्षिण कोरिया और जापान को निर्यात किया जाता है।

​बल्लारी - चित्रदुर्ग - चिकमगलूरू - तुमकूरू पेटी: यह पेटी कर्नाटक राज्य में स्थित है। यहाँ कुद्रेमुख खान से उत्पादित अयस्क का निर्यात किया जाता है। यहाँ से प्राप्त अयस्क घोल (Slurry) के रूप में पाइपलाइनों के माध्यम से मंगलूरू बंदरगाह तक भेजा जाता है।

​महाराष्ट्र - गोवा पेटी: यह पेटी गोवा और महाराष्ट्र राज्य में स्थित है। यहाँ रत्नागिरी (महाराष्ट्र) से अयस्क का उत्पादन किया जाता है। इस अयस्क को मार्मागाओ बंदरगाह द्वारा निर्यात किया जाता है।

​अन्य प्रमुख खनिज

​मैंगनीज: इसका उपयोग मुख्य रूप से इस्पात बनाने में किया जाता है। एक टन इस्पात बनाने के लिए लगभग 10 किग्रा मैंगनीज की आवश्यकता होती है। इसके अलावा पेंट, ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक आदि के निर्माण में भी काम में लिया जाता है। भारत में सर्वाधिक मैंगनीज का उत्पादन ओडिशा राज्य में किया जाता है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक राज्यों में भी उत्पादन होता है।

​ताँबा: भारत में ताँबे के भंडार बहुत कम हैं। ताँबा विद्युत की सुचालक व लचीली धातु है। इसका उपयोग विद्युत तार, उपकरण, मोटर, रसायन आदि में किया जाता है। भारत का 52% ताँबा मध्य प्रदेश की बालाघाट खदानों से प्राप्त होता है। इसके अलावा झारखंड का सिंहभूम तथा राजस्थान के खेतड़ी (सिंघाना) से ताँबे का उत्पादन किया जाता है।

​एल्युमीनियम (बॉक्साइट): बॉक्साइट अयस्क से एल्युमीनियम धातु प्राप्त की जाती है। यह एक हल्की, लचीली तथा विद्युत की सुचालक धातु है। इसका उपयोग विद्युत तार, बर्तन, विमान निर्माण आदि में किया जाता है। भारत में बॉक्साइट के जमाव अमरकंटक के पठार, मैकाल पहाड़ियों तथा विलासपुर-कटनी के पठारी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भारत में ओडिशा सर्वाधिक बॉक्साइट उत्पादन करने वाला राज्य है, जहाँ कोरापुट जिले में पंचपतमाली प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है।

​रोचक तथ्य: नेपोलियन तृतीय एल्युमीनियम की खोज के बाद अपने कपड़ों पर बटन एवं हुक एल्युमीनियम के पहना करता था तथा खास मेहमानों को एल्युमीनियम के बर्तनों में भोजन कराता था। इस घटना के तीस साल बाद पेरिस के भिखारियों के पास भी एल्युमीनियम के बर्तन होने लग गए।

​अधात्विक खनिज

​अभ्रक: अभ्रक खनिज परतों के रूप में पाया जाता है, जिसका चादरों के रूप में विपाटन आसानी से किया जा सकता है। इसका रंग काला, हरा, लाल, पीला या भूरा हो सकता है। इसकी उच्च वोल्टेज प्रतिरोधकता (विद्युत रोधक गुण) के कारण इसका उपयोग विद्युत उपकरण उद्योग में किया जाता है। यह छोटानागपुर पठार के उत्तरी किनारों, बिहार-झारखंड की कोडरमा-गया-हजारीबाग पेटी, राजस्थान के अजमेर तथा आंध्र प्रदेश के नेल्लौर जिले में पाया जाता है।

​चूना पत्थर: चूना पत्थर कैल्शियम कार्बोनेट व मैग्नीशियम कार्बोनेट से बनी चट्टानों में पाया जाता है। इसका जमाव अवसादी चट्टानों में अधिक होता है। इसका उपयोग सीमेंट उद्योग में कच्चे माल के रूप में तथा लौह प्रगलन की भट्टियों में होता है।

​खनन के जोखिम / खतरे

​खानों में काम करने वाले मजदूरों को धूल, धुएँ व हानिकारक गैसों में लगातार साँस लेने के कारण फेफड़ों की बीमारी (सिलिकोसिस आदि) का खतरा रहता है।

​खानों की छत गिरने, जल भरने या खान में आग लग जाने से मजदूरों की जान को हमेशा खतरा बना रहता है।

​खनन से प्राप्त अपशिष्ट पदार्थों से भूमि व नदियों का जल प्रदूषित होता है।

​खनिजों का संरक्षण

​बढ़ती जनसंख्या, बढ़ती खनिजों की माँग एवं अविवेकी उपयोग के कारण खनिज संसाधन तेजी से घट रहे हैं। खनिजों का निर्माण लाखों वर्षों की भू-गर्भीय प्रक्रियाओं से हुआ है, जबकि हम इनका दोहन बहुत तीव्र गति से कर रहे हैं। अतः भावी पीढ़ी के लिए सतत पोषणीय विकास का मार्ग अपनाना आवश्यक है। धातुओं का पुनर्चक्रण (Recycling) करके और नए विकल्पों का प्रयोग करके भी खनिजों का संरक्षण किया जा सकता है।

​ऊर्जा संसाधन

​ऊर्जा का उत्पादन ईंधन खनिजों जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम, जल विद्युत आदि से किया जाता है। ऊर्जा संसाधनों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा गया है:

​पारंपरिक ऊर्जा संसाधन: ऐसे ऊर्जा संसाधन जिनका उपयोग प्राचीन काल से किया जा रहा है। जैसे: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल विद्युत आदि।

​गैर-पारंपरिक ऊर्जा संसाधन: ऐसे ऊर्जा संसाधन जिनका उपयोग हाल के कुछ वर्षों से ही आरंभ हुआ है। जैसे: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, बायोगैस आदि।

​1. पारंपरिक ऊर्जा संसाधन

​कोयला: कोयला एक जीवाश्म ईंधन है। दलदली क्षेत्रों में पादपों के दबने से पीट कोयला बनता है, जिसमें कम कार्बन, उच्च नमी व निम्न ताप क्षमता होती है।

​लिग्नाइट: यह भूरे रंग का मुलायम तथा नमीयुक्त निम्न श्रेणी का कोयला है। इसके मुख्य भंडार नेवेली (तमिलनाडु) में हैं। इसका उपयोग विद्युत उत्पादन में होता है।

​बिटुमिनस: अधिक गहराई में उच्च तापमान व दबाव के कारण इसका निर्माण होता है। इसका उपयोग धातु शोधन एवं वाणिज्यिक कार्यों में किया जाता है।

​एंथ्रेसाइट: यह सर्वोत्तम गुणवत्ता वाला कठोर कोयला है।

​भारत में कोयले के निक्षेप दो प्रमुख भू-गर्भीय युगों की शैल में पाए जाते हैं:

​गोंडवाना क्रम की शैल: इनकी आयु 200 लाख वर्ष से भी अधिक है। यह दामोदर घाटी (पश्चिम बंगाल-झारखंड) के झरिया, रानीगंज, बोकारो तथा महानदी, सोन, वर्धा नदी घाटियों में पाए जाते हैं।

​टरशियरी क्रम की शैल: यह लगभग 55 लाख वर्ष पुराने हैं। यह मुख्यतः उत्तर-पूर्वी राज्यों—मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, असम व नागालैंड में पाए जाते हैं।

​पेट्रोलियम: कोयले के बाद दूसरा प्रमुख ऊर्जा संसाधन है। भारत में अधिकांश पेट्रोलियम टरशियरी क्रम की चट्टानों की अपनति (Anticlines) व भ्रंश ट्रैप में पाया जाता है। भारत में मुंबई हाई, गुजरात (अंकलेश्वर) और असम (डिगबोई, नाहरकटिया, मोरान-हुगरीजन) प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। डिगबोई (असम) भारत का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है।

​प्राकृतिक गैस: इसे पर्यावरण अनुकूल ईंधन माना जाता है क्योंकि यह CO_2 का कम उत्सर्जन करती है। कृष्णा-गोदावरी नदी बेसिन, मुंबई हाई तथा अंडमान-निकोबार में इसके विशाल भंडार हैं। 1700 किमी लंबी हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HVJ) पाइपलाइन मुंबई हाई को उत्तरी भारत के उर्वरक व विद्युत संयंत्रों से जोड़ती है। गाड़ियों में CNG (संपीड़ित प्राकृतिक गैस) का उपयोग व्यापक रूप से हो रहा है।

​जल विद्युत: बहते हुए जल से टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है, जो एक नवीकरणीय योग्य संसाधन है। उदाहरण: भाखड़ा नांगल परियोजना, दामोदर घाटी निगम, कोपिली हाइडल परियोजना आदि।

​2. गैर-पारंपरिक ऊर्जा संसाधन

​परमाणु या आणविक ऊर्जा: अणु की संरचना के विखंडन से प्राप्त ऊर्जा से विद्युत उत्पन्न की जाती है। इसके लिए यूरेनियम और थोरियम का उपयोग होता है, जो राजस्थान की अरावली श्रृंखला, झारखंड तथा केरल की मोनोजाइट बालू/रेत में पाए जाते हैं।

​सौर ऊर्जा: भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है। फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी (Photovoltaic technology) द्वारा सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत में बदला जाता है।

​पवन ऊर्जा: भारत में पवन ऊर्जा का विशालतम क्लस्टर तमिलनाडु के नागरकोइल से मदुरै तक स्थित है। इसके अलावा राजस्थान (जैसलमेर), आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात में भी पवन ऊर्जा के संयंत्र हैं।

​बायोगैस: ग्रामीण क्षेत्रों में झाड़ियों, कृषि अपशिष्ट, जैविक और पशु अपशिष्ट के अपघटन से बायोगैस बनती है। इसकी तापीय क्षमता मिट्टी के तेल, गोबर के उपलों तथा लकड़ी से बहुत अधिक होती है।

​ज्वारीय ऊर्जा: महासागरीय तरंगों और ज्वार-भाटा का उपयोग कर टरबाइन चलाकर विद्युत बनाई जाती है। भारत में खंभात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी (गुजरात) तथा सुंदरवन डेल्टा (पश्चिम बंगाल) में इसकी आदर्श दशाएँ मौजूद हैं।

​भू-तापीय ऊर्जा: पृथ्वी के आंतरिक भागों से निकलने वाली ऊष्मा का उपयोग करके उत्पन्न की जाने वाली ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं। भारत में हिमाचल प्रदेश के मणिकर्ण तथा लद्दाख की पुगा घाटी में इसके प्रायोगिक संयंत्र स्थापित किए गए हैं।

​ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण

​आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक मूलभूत आवश्यकता है। कृषि, उद्योग, परिवहन, व्यापार तथा घरेलू कार्यों के लिए ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना आवश्यक है। हमें "ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है" के सिद्धांत को अपनाते हुए गैर-पारंपरिक व नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

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