खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

                  अध्याय: खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

​खनिज एक निश्चित रासायनिक संरचना के साथ कार्बनिक एवं अकार्बनिक उत्पत्ति का एक प्राकृतिक पदार्थ है, जो किसी भी देश के औद्योगिक विकास को आधार प्रदान करता है।

खनिजों का वर्गीकरण:-

भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर खनिज दो प्रकार के होते हैं:

​1 धात्विक खनिज         2    अधात्विक खनिज

धात्विक खनिज:   ​i लौह धात्विक : लोहा, मैंगनीज

​ii अलौह धात्विक : ताँबा, बॉक्साइट

​2 अधात्विक खनिज:

​i ईंधन खनिज: कोयला, पेट्रोलियम

​ii गैर-ईंधन खनिज: चूना पत्थर, डोलोमाइट, जिप्सम

खनिजों की विशेषताएँ:

​खनिज विभिन्न क्षेत्रों में असमान रूप से वितरित होते हैं।

​खनिजों की मात्रा व गुणवत्ता में प्रतिलोमी (विपरीत) संबंध पाया जाता है। अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। सभी खनिज समय के साथ समाप्त होते हैं तथा इन्हें बनने में अधिक समय लगता है।

भारत में खनिजों का वितरण:-

​    भारत में धात्विक खनिज प्रायद्वीपीय पठार की क्रिस्टलीय चट्टानों में पाए जाते हैं, जबकि कोयले का अधिकांश भाग (97% तक) दामोदर, सोन, महानदी व गोदावरी नदी घाटी में पाया जाता है।

​      पेट्रोलियम के भंडार असम, गुजरात, मुंबई हाई व अरब सागर के अपतटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। नए खनिज क्षेत्र कृष्णा, गोदावरी व कावेरी बेसिन हैं।

भारत में इन खनिज क्षेत्रों को खनिज पट्टियों से जोड़ा गया है, जो निम्न हैं:

उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश: इस खनिज पेटी में छोटानागपुर पठार (झारखंड), उड़ीसा का पठार, पश्चिम बंगाल व छत्तीसगढ़ का क्षेत्र शामिल है। यहाँ लौह अयस्क, मैंगनीज, कोयला, बॉक्साइट और अभ्रक पाया जाता है।

दक्षिण-पश्चिमी पठारी प्रदेश: इस पट्टी में कर्नाटक, गोवा, केरल व तमिलनाडु का क्षेत्र शामिल है। यहाँ उच्च गुणवत्ता वाला लौह अयस्क, मैंगनीज व चूना पत्थर पाया जाता है। केरल में मोनाज़ाइट, थोरियम व बॉक्साइट तथा गोवा में लौह अयस्क अधिक पाया जाता है।

उत्तर-पश्चिमी प्रदेश: इस क्षेत्र में राजस्थान व गुजरात के अरावली क्षेत्र को शामिल किया जाता है। यहाँ धारवाड़ क्रम की शैलें पाई जाती हैं, जिनमें ताँबा व जिंक प्रमुख हैं। राजस्थान में बलुआ पत्थर, संगमरमर, जिप्सम, डोलोमाइट आदि खनिज पाए जाते हैं। गुजरात में पेट्रोलियम तथा राजस्थान व गुजरात में नमक के समृद्ध भंडार हैं।

हिमालय पट्टी: इस पेटी में ताँबा, सीसा, जस्ता, कोबाल्ट जैसे खनिज पाए जाते हैं। असम में खनिज तेल के भंडार पाए जाते हैं।

लौह खनिज:-

​भारत में लौह अयस्क के विशाल भंडार हैं। यहाँ हेमेटाइट एवं मैग्नेटाइट किस्म का लोहा पाया जाता है। भारत में लौह अयस्क के 95% भंडार उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु राज्यों में पाए जाते हैं।

उड़ीसा: सुंदरगढ़, मयूरभंज, झार क्षेत्रों की पहाड़ियों में गुरुमहिसानी, सुलापत, बादाम पहाड़, किरिबुरु एवं बोनाई प्रमुख अयस्क क्षेत्र हैं।

झारखंड: सिंहभूमि, नोवामुंडी व गुआ प्रमुख अयस्क खानें हैं।

छत्तीसगढ़: दुर्ग, दंतेवाड़ा, बैलाडिला, डल्ली व राजहरा प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक क्षेत्र हैं।

कर्नाटक: बल्लारी जिले में संदूर-होसपेट एवं चिकमंगलुरु जिले में बाबा बूदन की पहाड़ियाँ, शिमोगा, कुद्रेमुख, चित्रदुर्ग व तुमकुरु प्रमुख उत्पादक केंद्र हैं।

महाराष्ट्र: चंद्रपुर, भंडारा व रत्नागिरी।

तेलंगाना: करीमनगर, वारंगल।

आंध्र प्रदेश: कर्नूल, कड़पा, अनंतपुर।

तमिलनाडु: सेलम व नीलगिरी पहाड़ियाँ।




मैंगनीज:-     मैंगनीज लौह अयस्क के प्रगलन के लिए एक कच्चा माल है, जिसका उपयोग मिश्र धातु के निर्माण में किया जाता है। भारत में मैंगनीज उत्पादन में प्रथम स्थान उड़ीसा का है।

उड़ीसा: बोनाई, केन्दूझर, सुंदरगढ़, गंगपुर, कोरापुट, कालाहांडी व बोलनगीर।

महाराष्ट्र: नागपुर, भंडारा व रत्नागिरी।

​मध्य प्रदेश: बालाघाट, छिंदवाड़ा, निमाड़, मंडला व झाबुआ।

​अन्य उत्पादक राज्य: तेलंगाना, गोवा व झारखंड।

बॉक्साइट:-     बॉक्साइट एक अयस्क है, जिसका उपयोग एल्युमिनियम बनाने में किया जाता है। यह टर्शियरी क्रम की लेटेराइट चट्टानों में पाया जाता है। इसके भंडार मुख्यतः पठार, पर्वत एवं तटीय प्रदेशों में पाए जाते हैं। बॉक्साइट उत्पादन में उड़ीसा का प्रथम स्थान है।

उड़ीसा: कालाहांडी, संबलपुर, बोलनगीर व कोरापुट।

झारखंड: लोहरदगा जिले के पाटलैंड्स।

गुजरात: भावनगर व जामनगर।

छत्तीसगढ़: अमरकंटक पठार।

​मध्य प्रदेश: कटनी, जबलपुर व बालाघाट।

महाराष्ट्र: कोलाबा, ठाणे, रत्नागिरी, सतारा, पुणे व कोल्हापुर।

ताँबा:-    ताँबे का उपयोग विद्युत तार, मोटर, जनरेटर, ट्रांसफार्मर आदि के निर्माण में किया जाता है। यह एक मिश्रधातु योग्य, आघातवर्धनीय व तन्य धातु है। इसका उपयोग स्वर्ण आभूषणों को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए भी किया जाता है।

झारखंड: सिंहभूमि व हजारीबाग।

​मध्य प्रदेश: बालाघाट।

राजस्थान: झुंझुनूं (खेतड़ी ) व अलवर।

​अन्य क्षेत्र: आंध्र प्रदेश (गुंटूर जिले का अग्निगुंडाला), कर्नाटक (चित्रदुर्ग व हासन), तमिलनाडु (अर्काट जिला)।

​II अधात्विक खनिज

1. अभ्रक (Mica)

​अभ्रक का उपयोग विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों में किया जाता है।

झारखंड: यहाँ उच्च गुणवत्ता वाला अभ्रक हजारीबाग के पठार में 150 किम्ली लंबी व 22 किमी चौड़ी पट्टी में पाया जाता है।

​आंध्र प्रदेश: नेल्लोर प्रमुख उत्पादक केंद्र है।

राजस्थान: जयपुर से भीलवाड़ा और उदयपुर तक 320 किमी लंबी पट्टी में पाया जाता है।

​अन्य क्षेत्र: कर्नाटक (मैसूर व हासन), तमिलनाडु (कोयंबटूर, मदुरै, तिरुचिरापल्ली, कन्याकुमारी), महाराष्ट्र (रत्नागिरी), पश्चिम बंगाल (पुरुलिया व बांकुरा)।

​  ऊर्जा संसाधन: 

i  कोयला:-    कोयला एक ऊर्जा खनिज है, जिसका उपयोग विद्युत उत्पादन व अयस्क प्रगलन के लिए किया जाता है। कोयला मुख्यतः गोंडवाना एवं टर्शियरी क्रम की चट्टानों में पाया जाता है। भारत में 80% बिटुमिनस प्रकार का कोयला पाया जाता है।

गोंडवाना कोयला क्षेत्र: पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश।

​सर्वाधिक भंडार दामोदर घाटी (झारखंड व पश्चिम बंगाल) में हैं। यहाँ रानीगंज, झरिया, बोकारो, गिरिडीह, करणपुरा प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं।

​झरिया (सर्वाधिक) और रानीगंज (द्वितीय) प्रमुख उत्पादक हैं।

​अन्य नदियाँ: सोन, महानदी, गोदावरी घाटी।

​मध्य प्रदेश (सिंगरौली), छत्तीसगढ़ (कोरबा, रामपुर), उड़ीसा (तलचर), महाराष्ट्र (चांदा, वर्धा, कामटी, बांदेर), तेलंगाना (सिंगरेनी), आंध्र प्रदेश (पांडुर)।

टर्शियरी कोयला: असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय व नागालैंड में पाया जाता है।

मेघालय: चेरापूंजी, दरानगिरी, मेवलांग, लैंगरिन।

असम: माकुम, जयपुर, नजीरा।

​अरुणाचल प्रदेश: नामचिरिक-नामफुक।

जम्मू-कश्मीर: कालाकोट।

लिग्नाइट कोयला (भूरा कोयला): तमिलनाडु (नेवेली), गुजरात, पांडिचेरी, राजस्थान (बाड़मेर, बीकानेर, नागौर/सांचौर बेसिन)।






पेट्रोलियम:-    कच्चा पेट्रोलियम द्रव एवं गैसीय अवस्था के हाइड्रोकार्बन से युक्त होता है। इसका उपयोग मोटर वाहन, रेलवे तथा वायुयान में ईंधन के रूप में एवं पेट्रो-रसायन उद्योगों (उर्वरक, कृत्रिम रेशे, वैसलीन, मोम, साबुन आदि) में कच्चे माल के रूप में होता है। यह टर्शियरी क्रम की अवसादी चट्टानों में पाया जाता है।

​भारत में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग (ONGC) - 1956 की स्थापना के बाद इसकी खोज व उत्पादन प्रारंभ हुआ।  इससे पहले असम का डिगबोई एकमात्र पेट्रोलियम उत्पादक केंद्र था।

प्रमुख क्षेत्र:

असम: डिगबोई, नाहरकटिया, मोरान।

गुजरात: मेहसाणा, कलोल, अंकलेश्वर, नवागाम, कोसांबा व लूनेज।

महाराष्ट्र: मुंबई हाई (तट से 160 किमी दूर, 1973 में खोजा गया, 1976 में उत्पादन शुरू)।

​पूर्वी तट: कृष्णा, कावेरी व गोदावरी बेसिन।

तेल शोधन कारखाने (Refineries):

​i क्षेत्र आधारित: डिगबोई

​ii बाजार आधारित: बरौनी

प्राकृतिक गैस:- 

​GAIL (Gas Authority of India Limited) की स्थापना 1984 में प्राकृतिक गैस के परिवहन व व्यापार के लिए की गई थी। ​यह पेट्रोलियम भंडार के साथ पाई जाती है। इसका उपयोग ईंधन (CNG) व पेट्रोकेमिकल/उर्वरक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में होता है।

प्रमुख भंडार: मुंबई हाई, अपतटीय क्षेत्र, कृष्णा-गोदावरी बेसिन।

अपरंपरागत ऊर्जा स्रोत

​ये ऊर्जा के नवीन व नवीकरणीय स्रोत हैं जो पर्यावरण के अनुकूल हैं और सस्ती ऊर्जा प्रदान करते हैं।

​प्रमुख स्रोत: सौर, पवन, भू-तापीय, बायोमास, ज्वारीय ऊर्जा आदि।

नाभिकीय/परमाणु ऊर्जा:-

​यह यूरेनियम एवं थोरियम खनिजों के द्वारा प्राप्त की जाती है।

यूरेनियम: धारवाड़ क्रम की शैल में पाया जाता है।

​स्थान: सिंहभूमि (झारखंड), उदयपुर, अलवर, झुंझुनूं (राजस्थान), दुर्ग (छत्तीसगढ़), भंडारा (महाराष्ट्र), कुल्लू (हिमाचल प्रदेश)।

थोरियम: केरल के तटीय क्षेत्र की बालू (मोनोजाइट व इल्मेनाइट) से प्राप्त होता है।

​स्थान: केरल (पालक्काड, कोल्लम), विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश), महानदी डेल्टा (उड़ीसा)।

​संस्थान:

​1948: परमाणु ऊर्जा आयोग 

​1954: ट्रॉम्बे परमाणु ऊर्जा संस्थान (1967 में नाम बदलकर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र - BARC किया गया)।

प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा परियोजनाएं:

​तारापुर (महाराष्ट्र)

​रावतभाटा (राजस्थान)

​कैगा (कर्नाटक)

​कलपक्कम (तमिलनाडु)

​नरोरा (उत्तर प्रदेश)

​काकरापार (गुजरात)




​सौर ऊर्जा:-         फोटोवोल्टाइक सेलों में सूर्य की किरणों को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। यह कम लागत वाली व पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा है। भारत के पश्चिमी भागों (गुजरात व राजस्थान) में सौर ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएँ हैं।

पवन ऊर्जा

​यह प्रदूषण मुक्त एवं असमाप्य स्रोत है। पवन की गतिज ऊर्जा को टरबाइन की सहायता से विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में इसके अनुकूल दशाएँ हैं।

ज्वारीय तथा तरंग ऊर्जा

​महासागरीय तरंगों और ज्वार-भाटा से उत्पन्न ऊर्जा। भारत के पश्चिमी तट पर इसकी अपार संभावनाएँ हैं।

​भू-तापीय ऊर्जा:- 

​पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाली ऊष्मा या गर्म जल के स्रोतों (गीजर/चश्मों) से प्राप्त ऊर्जा।

​भारत में पहला भू-तापीय ऊर्जा संयंत्र मणिकरण (हिमाचल प्रदेश) में स्थापित किया गया है।

जैव ऊर्जा (Biomass Energy):-    कृषि अवशेष, नगरपालिका व औद्योगिक कचरे को ऊर्जा में परिवर्तित करना। इससे कचरे का निस्तारण और ऊर्जा उत्पादन दोनों होते हैं। दिल्ली के ओखला क्षेत्र में नगरपालिका कचरे को ऊर्जा में बदलने वाला संयंत्र स्थित है।

खनिज संसाधनों का संरक्षण:-     सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।

संरक्षण के उपाय:

  • ​सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा व भू-तापीय ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करना।
  • ​धातुओं का पुनर्चक्रण (Recycling): ताँबा, सीसा, जस्ता जैसी सीमित धातुओं के लिए स्क्रैप (छीजन) का प्रयोग करना।
  • ​दुर्लभ धातुओं के स्थान पर प्रतिस्थापकों (Substitutes) का प्रयोग करना।
  • सामरिक एवं अति-अल्प खनिजों के निर्यात को घटाना ताकि उनका लंबे समय तक उपयोग हो सके।

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