भूमण्डलीकृत विश्व का बनना

                       अध्याय - 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना

​भूमण्डलीकरण / वैश्वीकरण: एक देश की अर्थव्यवस्था को विश्व के अन्य देशों के साथ जोड़ना भूमण्डलीकरण कहलाता है।

​एक ग्लोबल विश्व: दुनिया के विभिन्न देश व्यापार, विचार एवं संस्कृति के आदान-प्रदान के कारण एक दूसरे से आपस में जुड़े हुए हैं। वर्तमान में आपसी संपर्क तेजी से बढ़ा है।

​सिल्क रूट: चीन को पश्चिमी देशों एवं अन्य देशों से (भारत, अफ़गानिस्तान, फ़ारस, ईरान, भूमध्य सागर आदि) से जोड़ने वाला व्यापारिक मार्ग सिल्क रूट अथवा रेशम मार्ग कहलाता है। इस मार्ग से मुख्यतः रेशम, चीन के पॉटरी एवं सोना, चांदी का व्यापार किया जाता था। इसी मार्ग के द्वारा ईसाई, इस्लाम, बौद्ध आदि धर्मों का विश्व में प्रचार हुआ। यह मार्ग ईसा के आरम्भ से पहले अस्तित्व में आया तथा 15वीं सदी तक बरकरार रहा।

​भोजन की यात्रा: जल्द तैयार होने वाला खाद्यान्न जैसे - नूडल्स चीन की देन है, भारत में इसे सवैयाँ के रूप में वर्षों से उपयोग ले रहे हैं। इसका इटालियन रूप स्पैगेटी कहलाता है। 5वीं सदी में अरब यात्रियों के साथ पास्ता सिसली द्वीप (इटली) तक पहुँचा था। आज के अनेक खाद्यान्न आलू, मिर्ची, टमाटर, मूँगफली, मक्का आदि यूरोप में तब आए जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की थी।

आलू: आलू के आने के बाद यूरोप के लोगों के जीवन में बदलाव आए। आलू के आने से यूरोपीय लोग इस स्थिति में आ गए कि बेहतर खाना खा सकें एवं अधिक दिनों तक जीवन जी सकें। आयरलैंड के किसान आलू पर निर्भर हो गए थे।लेकिन 1840 के दशक में बीमारी के कारण आलू की फसल खराब हो गयी। जिससे लाखों लोग भूख से मारे गए, इस अकाल को आइरिस अकाल के नाम से जाना जाता है।

​विजय, बीमारी और व्यापार: 16वीं सदी में यूरोपियों ने एशिया एवं अफ्रीका, अमेरिका के लिए समुद्री मार्ग खोज लिए थे। इन मार्गों ने व्यापार के साथ विश्व के अन्य भागों में भी यूरोप की विजय की नींव रखी। अमेरिका के अनाज एवं खनिजों के भंडारों ने दुनिया के अन्य लोगों का जीवन पूर्णतः बदल दिया। 16वीं सदी के मध्य तक पुर्तगाल एवं स्पेन के द्वारा अमेरिकी उपनिवेशी की शुरुआत की गयी। लेकिन यूरोपियों की यह जीत किसी हथियार के कारण न होकर बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने के कारण हुई। यूरोप के लोगों पर चेचक का आक्रमण पहले हो चुका था अतः उन्होंने बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली थी, जबकि अमेरिका के लोगों के पास इस बीमारी से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी। जब यूरोपीय लोग अमेरिका पहुँचे तो अपने साथ चेचक के जीवाणु भी ले गए। जिसका परिणाम यह हुआ कि चेचक ने अमेरिका के अनेक भागों की आबादी को पूर्णतः समाप्त कर दिया, अतः यूरोपियों ने आसानी से अमेरिका पर अधिकार कर लिया।

​यूरोप की समस्याएँ: 19वीं सदी तक यूरोप में अनेक समस्याएँ थीं जैसे - गरीबी, बीमारी एवं धार्मिक टकराव आदि। इसके कारण धर्म के खिलाफ बोलने वाले लोग सजा के डर के कारण अमेरिका भाग गए तथा इन्होंने अमेरिका पहुँचकर अवसर का फायदा उठाया एवं तरक्की की।

​18वीं सदी तक भारत एवं चीन: 18वीं सदी तक भारत एवं चीन दुनिया के सबसे धनी देश हुआ करते थे। ​लेकिन 15वीं सदी से ही चीन ने बाहरी संपर्क कम कर दिए तथा दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग हो गया। अतः चीन के घटते प्रभाव एवं अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के कारण विश्व में व्यापार का मुख्य केंद्र यूरोप बन गया।

​19वीं शताब्दी (1815-1914): 18वीं सदी में भारत एवं चीन धनी देश थे, जिनका एशिया के व्यापार में प्रभुत्व था। लेकिन 19वीं सदी में तेजी से बदलाव आये। इस अवधि में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं तकनीकी के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन हुए। जिससे विभिन्न देशों के आर्थिक संबंधों में भी बदलाव देखे गए। अनेक अर्थशास्त्री मानते थे कि आर्थिक बदलाव व आदान-प्रदान तीन प्रकार से होता है:

​व्यापार का आदान-प्रदान: 19वीं सदी में मुख्यतः कपड़ा व गेहूँ का व्यापार हुआ।

​श्रम का व्यापार या आदान-प्रदान: इस समय काम की तलाश में लोग दूसरे स्थानों पर प्रवास कर रहे थे।

​पूंजी का आदान-प्रदान: इस समय लोग दूर स्थित क्षेत्रों में अधिक पूंजी का निवेश करने लगे थे।

​वैश्विक अर्थव्यवस्था का उदय: यूरोप में उत्पादन एवं उपभोक्ता का बदलता रूप प्रत्येक देश को भोजन के आधार पर आत्मनिर्भर बनाया था। लेकिन यूरोप में आत्मनिर्भर बनने का अर्थ लोगों के लिए निम्न गुणवत्ता का भोजन मिलना था। 18वीं सदी में ब्रिटेन में जनसंख्या वृद्धि हुई। जिसके कारण भोजन की माँग में वृद्धि हुई। जमींदारों के दबाव के कारण सरकार ने मक्का के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। अतः भोजन की कीमत बढ़ गई। इसलिए लोगों ने सरकार को कॉर्न लॉ (Corn Law) समाप्त करने के लिए बाधित किया।

​कॉर्न लॉ हटाने के प्रभाव: कॉर्न लॉ हटने का अर्थ ब्रिटेन में उत्पादित भोजन की तुलना में आयात किया गया भोजन सस्ता होता था। ब्रिटेन के किसानों के द्वारा उत्पादित भोजन आयात किए गए सस्ते भोजन के सामने टिक नहीं पाया। खेती की जमीन का एक बड़ा हिस्सा खाली छोड़ दिया गया तथा लोग बेरोजगार हो गए तथा अनेक लोग काम के लिए दूसरे शहरों में चले गए। साथ ही उद्योगों के कारण से लोगों की आय भी बढ़ने लगी, जिसके कारण ब्रिटेन में भोजन की माँग बढ़ने लगी। ब्रिटेन ने भोजन आयात करना शुरू किया तथा माँग को पूरा करने के लिए यूरोप, अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया में भूमि को साफ किया जाने लगा। अनाज के परिवहन के लिए रेल लाइनें बिछाई गयीं तथा खेत में काम करने के लिए नयी आबादी बसाने की आवश्यकता हुई। अतः लंदन जैसे शहरों में से पूंजी आने लगी। मजदूरों की आवश्यकता के कारण लोग अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया में पलायन कर गये। 19वीं सदी में 5 करोड़ लोग यूरोप से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया पहुँचे।1820 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हो चुका था। अतः श्रम प्रवाह एवं तकनीकी में परिवर्तन हुआ।

​तकनीकी की भूमिका: इस समय की अर्थव्यवस्था में तकनीकी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युग में रेलवे, भाप का इंजन, टेलीग्राफ आदि का विकास हुआ। रेलवे ने बंदरगाहों को आंतरिक भागों से जोड़ा। संचार व्यवस्था में तेजी से वृद्धि हुई जिससे आर्थिक लेन-देन की गति बढ़ी।

​मांस का व्यापार: इस समय तकनीकी की सहायता से लोगों के जीवन को बदलने में सहायता हुई। 1870 तक जानवरों को जिन्दा अमेरिका से यूरोप ले जाया जाता था। जिससे अनेक जानवर रास्ते में बीमार हो जाते थे या मर जाते थे। अतः यूरोपीय लोगों के लिए मांस एक विलासिता की वस्तु थी। रेफ्रिजरेशन की तकनीकी ने यूरोपियों के जीवन में बदलाव ला दिया। अब जानवरों को अमेरिका में ही हलाल किया जाता था तथा मांस को डिब्बों में बंद करके यूरोप में आसानी से अधिक मात्रा में भेजा जा सका। अतः अब यूरोप में आम आदमी भी मांस खा सकता था। खाद्यान्न आपूर्ति के कारण यूरोप में सामाजिक शांति आ गयी। अतः यूरोपियों ने उपनिवेशी महत्वाकांक्षा के गले उतारना शुरू कर दिया।

              ​19वीं सदी का उत्तरार्द्ध एवं उपनिवेशवाद: एक तरफ व्यापार बढ़ने के कारण यूरोपीय लोगों का जीवन बेहतर हो गया, जबकि दूसरी तरफ उपनिवेशी देशों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। यदि अफ्रीका के देशों को देखा जाए तो सभी देशों की सीमाएँ एक सीधी रेखा के समान हैं, क्योंकि 1885 में यूरोप की बड़ी शक्तियां बर्लिन में मिलीं तथा अफ्रीका महाद्वीप को आपस में बाँट लिया।

​रेंडरपेस्ट या मवेशियों में प्लेग: रेंडरपेस्ट पशुओं में होने वाली बीमारी थी, जिसने अफ्रीकन क्षेत्रों को प्रभावित किया। अफ्रीका में भूमि एवं खनिजों के अपार भंडार थे। अतः यूरोपीय लोग खनिजों व बागानों से धन कमाने के लिए अफ्रीका पहुँचे। लेकिन अफ्रीका में मजदूरों की कमी थी तथा स्थानीय लोग मजदूरी देने के बाद भी काम करने को तैयार नहीं थे, क्योंकि यहाँ जनसंख्या कम होने के कारण लोगों की आवश्यकताएँ कम हो जाती थीं। अतः धन कमाने के लिए काम करने की जरूरत नहीं थी।

​यूरोपीय लोगों ने अफ्रीका के लोगों से काम करवाने के लिए निम्न तरीके अपनाए:

  • ​लोगों पर इतना अधिक टैक्स लगाया कि उसे केवल वो लोग ही चुका पाते थे जो खान एवं बागानों में काम करते थे।
  • ​उत्तराधिकार का नियम बदल दिया जिसके तहत अब परिवार का एक ही सदस्य उस जमीन का उत्तराधिकारी बन सकता था। अतः बाकी लोगों को मजदूरी करनी पड़ी।
  • खान में काम करने वाले मजदूरों को खनन क्षेत्र में ही रहना पड़ता था, उन्हें बाहर घूमने की छूट नहीं थी।

रेंडरपेस्ट: 1890 के दशक में रेंडरपेस्ट का आगमन हुआ। यह बीमारी ब्रिटिश एशिया से लाए गए घोड़ों के साथ आयी। ऐसा उन इटालियन सैनिकों की मदद के लिए किया गया जो पूर्वी अफ्रीका पर आक्रमण कर रहे थे। कुछ दिनों बाद यह बीमारी पूरे अफ्रीका में फैल गई। 1892 में इस बीमारी से 90% पशु मारे गए। अफ्रीका के लिए मवेशियों का नुकसान आजीविका का नुकसान था। अतः उनके पास बागान एवं खानों में मजदूरी के सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं था। इस तरह मवेशियों की बीमारी ने यूरोपियों को अफ्रीका में उपनिवेश बढ़ाने में मदद की।

​भारत से बंधुआ मजदूरों का पलायन:       ऐसे मजदूर जो मालिकों के लिए निश्चित अवधि के लिए काम करने को प्रतिबद्ध होते थे, उन्हें बंधुआ मजदूर कहा जाता है। उस समय बिहार, U.P., बंगाल, M.P., तमिलनाडु के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में गरीब लोग बंधुआ मजदूर बनते थे। इन लोगों को मुख्यतः फिजी, गुयाना एवं वेस्टइंडीज ले जाया जाता था तथा भारत में अनेक बंधुआ मजदूरों को असम में चाय के बागानों में लगाया गया। एजेंट अफसर झूठे वादे करते थे, मजदूरों को यह भी पता नहीं होता था कि वे कहाँ जा रहे हैं। इन मजदूरों के लिए इन जगहों पर बड़ी भयावह स्थिति होती थी, उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होते थे तथा उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी काम करना पड़ता था। 19वीं सदी की इस अनुबंध व्यवस्था को 'नई दास प्रथा' कहा जाता था। 20वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवादियों ने बंधुआ मजदूर प्रणाली का विरोध किया, अतः 1921 में बंधुआ मजदूर प्रणाली को समाप्त कर दिया।

​विदेशों में भारतीय व्यवसायी: भारत के नामी बैंकर एवं व्यवसायियों में शिकारीपुरी श्रॉफ एवं नट्टुकोट्टई चेट्टियार का नाम आता है। यह दक्षिण एवं मध्य एशिया में कृषि निर्यात में पूंजी निवेश करते थे। उस समय विभिन्न क्षेत्रों में पैसे भेजने के लिए इनका एक अलग परिष्कृत तंत्र था। भारतीय व्यवसायी उपनिवेशिक शासकों के साथ अफ्रीका भी पहुँच चुके थे। हैदराबाद के सिंधी व्यवसायी यूरोपीय उपनिवेशों से भी आगे थे। 1860 के दशक तक इन्होंने अपनी पहचान बना ली थी।

​भारतीय व्यापार, उपनिवेश एवं वैश्विक तंत्र: भारत से महीन रेशे वाले कपास एवं सूती वस्त्र निर्यात होते रहे। लेकिन उद्योगों के विकास के कारण स्थानीय उत्पादकों ने ब्रिटिश सरकार को भारत से आने वाले कपास के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रयास किया। अतः ब्रिटेन में बने कपड़े भारतीय बाजार में आने लगे। 1800 में भारत से कपड़ों का 30% निर्यात होता था, जो 1815 में घटकर 15% तथा 1870 के दशक में 3% रह गया। इस समय निर्यात की गई वस्तुओं में नील के निर्यात में वृद्धि हुई तथा भारत से सबसे ज्यादा निर्यात की जाने वाली वस्तु अफीम को चीन भेजा जाता था। फिर भारत से ब्रिटेन को कच्चे माल का निर्यात होने लगा तथा ब्रिटेन से आयात बढ़ने लगा, जिससे ब्रिटेन के व्यापार में वृद्धि हुई। इस तरह से भारतीय बाजार से ब्रिटेन को जो आय प्राप्त होती थी, उसे अन्य उपनिवेशों में उपयोग में लिया जाता था तथा भारत में रहने वाले अधिकारियों को भी होम चार्ज (Home Charges) के रूप में कुछ लाभ दिया जाता था। भारत के बाहरी कर्ज की भरपाई तथा अधिकारियों की पेंशन का खर्चा भी होम चार्ज से होता थी।

​युद्ध काल की अर्थव्यवस्था: प्रथम विश्व युद्ध ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को बदल दिया था। जिसमें लगभग 90 लाख लोग मारे गए तथा 2 करोड़ से अधिक लोग घायल हो गए। ये मरने वाले लोग आर्थिक क्रियाओं से जुड़े हुए थे। अतः यूरोप में काम करने वाले मजदूरों की कमी आ गयी। परिवार में कमाने वालों की संख्या कम होने के कारण आय घट गई तथा पुरुषों को सेना में अधिक शामिल किया जाने के कारण कारखानों में महिलाएँ काम करने लगीं। अर्थात जो काम पुरुषों के माने जाते थे, वह अब महिलाएँ करने लगीं। इस युद्ध के बाद ब्रिटेन को अमेरिका से कर्ज लेना पड़ा। युद्ध ने अमेरिका को अंतर्राष्ट्रीय साहूकार बना दिया, अब अमेरिका की संपत्ति अधिक थी।

​युद्ध के बाद के सुधार: जब ब्रिटेन युद्ध कर रहा था, तब भारत एवं जापान में उद्योगों का विकास हुआ। जिससे युद्ध के बाद ब्रिटेन को अपना अस्तित्व बनाए रखने में परेशानी होने लगी। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन, जापान से कमजोर हो गया। युद्ध के समय ब्रिटेन में वस्तुओं की माँग बढ़ने के कारण वहाँ की अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ, लेकिन युद्ध समाप्त होने के कारण माँग में गिरावट आई। अतः ब्रिटेन के 20% मजदूरों को काम से हाथ धोना पड़ा। युद्ध के पहले पूर्वी यूरोप गेहूं का निर्यातक था, लेकिन पूर्वी यूरोप के युद्ध में शामिल होने के कारण कनाडा, अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया युद्ध के बाद निर्यातक देश बन गए। युद्ध खत्म होने के बाद यूरोप में पुनः गेहूं की सप्लाई शुरू हुई, अतः बाजार में गेहूं अधिक आने के कारण गेहूं की कीमत कम हो गयी। जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर हो गयी।

​बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत: युद्ध के बाद अमेरिका की अर्थव्यवस्था में सुधार होने लगा। 1920 के दशक में अधिक उत्पादन अमेरिकन अर्थव्यवस्था की पहचान बनी। फोर्ड मोटर के संस्थापक हेनरी फोर्ड को मास प्रोडक्शन (बड़े पैमाने पर उत्पादन) का जनक माना जाता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन बढ़ा एवं कीमत घटी। 1919 में 20 लाख कार उत्पादित की गयी थीं, जो 1929 में बढ़कर 50 लाख हो गयीं। इसी तरह अन्य सामान जैसे फ्रिज, वाशिंग मशीन, रेडियो, ग्रामोफोन आदि की माँग बढ़ी तथा आसान किश्तों में कर्ज की सुविधा के कारण ही माँग में वृद्धि हुई। 1923 में अमेरिका दुनिया के अन्य देशों में पूंजी निर्यात करके बड़ा विदेशी साहूकार बन गया, जिससे यूरोप की अर्थव्यवस्था में भी सुधार हुआ।

​विश्व व्यापी मंदी:

​आवश्यकता से अधिक कृषि उत्पादन: 1929 में आवश्यकता से अधिक उत्पादन हुआ तथा कृषि उत्पादों के अधिक व्यापार के कारण कीमतों में कमी आई। जिसकी भरपाई करने के लिए किसानों ने और अधिक उत्पादन किया, अतः आवश्यकता से अधिक फसल सड़ने लगी।

​अमेरिका द्वारा कर्ज में कमी: यूरोप कर्ज के लिए अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर था। 1928 के आरंभ में 100 करोड़ डॉलर कर्ज था, लेकिन एक साल के बाद यह घटकर 24 करोड़ हो गया। जिसके कारण अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा, जिससे यूरोप के राष्ट्रों की मुद्रा बर्बाद हुई। ब्रिटिश पाउंड में भी कमी आई। अतः अमेरिका ने व्यापार शुल्क को बढ़ा दिया, जिससे विश्व की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। इस मंदी का अमेरिका पर बुरा प्रभाव पड़ा। बैंकों ने कर्ज देने में कमी कर दी तथा पुराना कर्ज वसूलना शुरू किया। लोग कर्ज चुकाने में असमर्थ हो गए अतः बैंकों के लिए कर्ज वसूलना असंभव हो गया। 1933 तक अमेरिका के चार हजार बैंक बंद हो गए तथा लगभग 1 लाख 10 हजार कंपनियाँ बंद हो गयीं।

​आर्थिक मंदी और भारत: आर्थिक मंदी का भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। 1928 से 1934 के बीच भारत का व्यापार घटकर आधा हो गया। इस समय गेहूं की कीमत 50% तक घट गयी। इन घटती कीमतों के बाद भी सरकार किसानों से उतना ही कर्ज वसूलना चाहती थी। अतः किसानों को अपनी जमा पूंजी निकालनी पड़ी, जमीन एवं जेवर बेचने पड़े। अतः भारत कीमती धातुओं (विशेषकर सोने) का निर्यात करने लगा। भारत के शहरी क्षेत्रों में कीमत घटने के कारण लोगों का जीवन आसान हो गया। राष्ट्रवादी नेताओं के दबाव के कारण उद्योगों के विकास में भी वृद्धि हुई।

​युद्ध के बाद के समझौते: द्वितीय विश्व युद्ध पहले युद्ध की तुलना में बिल्कुल अलग था। इसमें आम नागरिक अधिक मारे गए तथा अनेक शहर बर्बाद हो गए। इसके बाद की स्थिति में सुधार निम्न बिंदुओं से प्रभावित हुआ। 

  • ​पश्चिम में अमेरिका एक प्रबल आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक शक्ति के रूप में उभरा।
  • ​सोवियत संघ का एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तन हुआ।

इस युद्ध के बाद निम्न दो बिंदुओं पर चर्चा की गई:

(i) औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन बनाए रखना तथा पूर्ण रोजगार दिलवाना।

(ii) पूंजी, वस्तु एवं मजदूरों के प्रवाह पर बाहरी दुनिया के प्रभाव को नियंत्रित करना।

​युद्ध के बाद की व्यवस्था [ब्रेटन वुड्स संस्थान]: जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर प्रांत के ब्रेटन वुड्स शहर में संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक व वित्तीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की स्थापना की गई। इस संस्था को सदस्य देशों के लाभ व हानि (आर्थिक संतुलन) की देखभाल के लिए बनाया गया। युद्ध के बाद पैसों का इंतजाम करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण व विकास बैंक की स्थापना की गई, जिसे विश्व बैंक कहा जाने लगा। इसलिए युद्ध के बाद की प्रणाली को ब्रेटन वुड्स सिस्टम कहा जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक ने 1947 में कार्य करना शुरू किया। इस संस्था के अहम मुद्दों पर अमेरिका वीटो चलाता था। ब्रेटन वुड्स सिस्टम का आधार विभिन्न मुद्राओं के लिए निर्धारित दर थी। अतः डॉलर की कीमत को सोने की कीमत से जोड़ा गया। एक औंस सोने की कीमत 35 डॉलर के समान थी।

​प्रारंभिक वर्ष: ब्रेटन वुड्स सिस्टम ने पश्चिमी औद्योगिक देशों व जापान में आर्थिक विकास की शुरुआत की। 1950 से 1970 के बीच व्यापार में 8% एवं आय में 5% तक की वृद्धि हुई तथा बेरोजगारी में कमी आई।

​उपनिवेशों का अंत व आजादी: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अनेक उपनिवेश आजाद हो गए तथा नए देश के रूप में सामने आए। ये देश शोषण के कारण आर्थिक संकट में थे। आरंभ में ब्रेटन वुड्स संस्थान इन देशों की सहायता करने में सक्षम नहीं थे। इस समय यूरोप व जापान अधिक विकास करके इस संस्था से बाहर हो गए, अतः 1950 के अंत में ब्रेटन वुड्स संस्थान ने विकासशील देशों की ओर ध्यान दिया। यह संस्था उपनिवेशी ताकतों के नियंत्रण में थी। एक नए आर्थिक विकास के लिए G-77 (जी-77) समूह बनाया गया, जिनकी माँग प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण, उत्पादों की सही कीमत तथा बाजार विकसित करना था।

​ब्रेटन वुड्स का अंत एवं भूमण्डलीकरण: 1960 के दशक तक अनेक देशों के हस्तक्षेप (दखलंदाजी) के कारण अमेरिका की ताकत में कमी आने लगी। ​तथा डॉलर की कीमत घटने लगी। अतः निर्धारित विनिमय प्रणाली समाप्त हुई तथा अस्थाई (परिवर्तनशील) विनिमय दर की शुरुआत हुई। 1970 के दशक में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था बदल गई। अतः अब उन्हें व्यापारिक बैंकों एवं निजी कर्जदाताओं से कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे विकासशील देशों में अधिक कर्ज, बेरोजगारी एवं घटती आय की समस्या उत्पन्न हुई।

           1949 के बाद चीन ने भी नई आर्थिक नीति अपनाई तथा विश्व की अर्थव्यवस्था के नजदीक होने लगा। पूर्वी यूरोपीय देशों में भी अनेक देश नई अर्थव्यवस्था से जुड़ने लगे। भारत, चीन, ब्राजील तथा मलेशिया आदि देशों में मजदूरी कम थी, अतः बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इन देशों में अपने उत्पादन को बढ़ाने लगीं। भारत बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

​वीटो [निषेधाधिकार]: किसी एक सदस्य की असहमति पर किसी भी प्रस्ताव को खारिज करने का अधिकार वीटो पावर कहलाता है।

​आयात शुल्क: आयात की जाने वाली वस्तुओं पर दिया जाने वाला कर।

​विनिमय दर: विश्व व्यापार की सुविधा के लिए विभिन्न देशों की मुद्रा को एक दूसरे से जोड़ना। विनिमय दर दो प्रकार की होती है:

​स्थिर विनिमय दर: जब विनिमय की दर स्थिर हो एवं उस पर उतार-चढ़ाव पर सरकार का नियंत्रण हो।

​2. परिवर्तनशील विनिमय दर: यह दर विदेशी मुद्रा बाजार में मुद्रा की माँग व आपूर्ति के आधार पर घटती एवं बढ़ती रहती है, अर्थात इस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता है।

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