मुद्रण संस्कृति एवं आधुनिक दुनिया

 अध्याय-5: मुद्रण संस्कृति एवं आधुनिक दुनिया

पहली छपी हुई किताबें:- मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान एवं कोरिया में विकसित हुई। चीन में 594 ई. में स्याही लगी काठ की तख्ती पर रगड़कर किताबें छापी जाने लगीं, अतः कागज के दोनों तरफ छपाई संभव नहीं थी। अतः पारंपरिक चीनी किताबें एकोर्डियन शैली में किताबों को मोड़ने के बाद सिलकर बनाई जाती थीं। किताबों का लेखन करने वाले खुशनवीश (कुशल सुलेखक) होते थे, जो हाथ से सुंदर अक्षर लिखते थे।

​           इस समय मुद्रित वस्तुओं का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतंत्र था। सिविल सेवा परीक्षा के द्वारा चीन का प्रशासन विकसित हुआ। इन परीक्षाओं के लिए चीन ने अनेक किताबें छपवाईं। 16वीं सदी में परीक्षा देने वालों की संख्या बढ़ने के कारण किताबों की संख्या भी बढ़ी। 17वीं सदी तक चीन में शहरों के विकास के साथ छपाई का उपयोग भी बढ़ा। अब अधिकारियों के साथ-साथ व्यापारी अपने दैनिक कार्यों के लिए मुद्रित वस्तुओं का प्रयोग करने लगे।

​पाठक वर्ग के द्वारा कविताएँ, नाटक, आत्मकथा आदि का लेखन किया जाने लगा। अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया तथा काव्य एवं नाटक लिखने लगीं। 19वीं सदी के अंत में पश्चिमी शैली के संस्कृति की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला शंघाई प्रिंट संस्कृति का नया केंद्र बन गया।

जापान में मुद्रण:- सन् 768 से 770 ई. के आस-पास चीनी बौद्ध प्रचारक छपाई की तकनीक लेकर जापान आए। जापान में 868 ई. में छपी सबसे पुरानी पुस्तक 'डायमंड सूत्र' है। मध्यकाल में जापान में अनेक कवियों व लेखकों ने किताबें छापना शुरू किया। इस समय हाथ से छपी विभिन्न प्रकार की किताबें जैसे—महिलाओं, संगीत जैसी किताबें चाय की दुकान, रसोईघर, पुस्तकालय आदि में दिखाई देती थीं। अर्थात अब किताबों की कमी नहीं थी।

यूरोप में मुद्रण का आना:- महान खोजी यात्री मार्को पोलो कई साल तक चीन में खोज करने के बाद 1295 में इटली पहुँचा। वह अपने साथ चीन की वुडब्लॉक (काठ की तख्ती) पर छपाई की तकनीक साथ लेकर आया। अब इटली में भी तख्ती की छपाई से किताबें छपने लगीं। कुछ समय बाद यह तकनीक पूरे यूरोप में फैल गई। यह मुद्रित किताबें सस्ती व अश्लील मानने वाले कुलीन वर्गों एवं भू-स्वामी वर्गों के लिए नहीं छपी थीं। किताबों के विलासी संस्करण अब भी वेलम (चर्मपत्र) पर ही छपते थे। व्यापारी एवं विद्यार्थी सस्ती किताबें खरीदते थे। लेकिन किताबों की माँग हस्तलिखित पांडुलिपियों से पूरी नहीं होती थी। नकल उतारना अधिक खर्चीला व अधिक समय लगने वाला कार्य था। इस समय इन पांडुलिपियों का रखरखाव मुश्किल कार्य था। अतः वुडब्लॉक प्रिंटिंग लोकप्रिय होता गया।

योहानेस गुटेनबर्ग एवं प्रिंटिंग प्रेस:- गुटेनबर्ग बचपन से ही तेल एवं जैतून प्रेस की मशीन देखता था। उसने पत्थर पर पॉलिश करने की कला, आभूषण बनाने का कार्य एवं सीसे से कलात्मक वस्तुएँ बनाना सीखा। जैतून प्रेस का मॉडल आदर्श बना, जिसमें सांचे का उपयोग अक्षरों की धातु आकृति बनाने के लिए किया गया। गुटेनबर्ग ने 1448 तक इस उपकरण का निर्माण कर लिया था तथा इस नए उपकरण के द्वारा छापी गई पहली पुस्तक 'बाइबिल' थी, जिसकी 180 प्रतियाँ बनाने में उसे लगभग तीन साल लगे।

​          आरंभ में ये किताबें पांडुलिपि की तरह दिखाई देती थीं, जिसके हाशिए पर फूल-पत्तियों की डिजाइन बनाई जाती थी। अमीरों की किताबों में हाशिए की जगह खाली छोड़ दी जाती थी, जिसमें खरीदार अपनी रुचि के हिसाब से डिजाइन तय करके प्रिंट करवाया करता था। 1450-1550 के बीच यूरोप में अनेक कारखाने लगाए गए। जर्मनी के मुद्रक विभिन्न देशों में जाकर छापेखाने खुलवाया करते थे। 15वीं सदी के अंत में यूरोप में लगभग 2 करोड़ किताबें बाजार में आईं, जो 16वीं सदी में 20 करोड़ हो गईं। अब हाथ की छपाई के स्थान पर यांत्रिक मुद्रण के आने से छपाई के कार्य में क्रांति आ गई।

मुद्रण क्रांति एवं उसका असर:-

नया पाठक वर्ग:- छपाई तकनीक के आने से नया पाठक वर्ग विकसित हुआ। किताबों के उत्पादन में कम समय व श्रम लगने के कारण बड़ी संख्या में किताबें छपीं, अतः बाजार किताबों से भर गया, जिससे किताबों की कीमत में कमी आ गई। इस समय किताबें समाज के बड़े वर्गों तक पहुँचने लगीं। अब जनता पाठक वर्ग के रूप में अस्तित्व में आई, लेकिन ये किताबें केवल साक्षर लोग ही पढ़ सकते थे। जो नहीं पढ़ सकते थे, वे बोलकर पढ़े गए पाठ को सुनकर आनंद उठाते थे। अतः मुद्रकों ने लोकगीत एवं लोककथाएँ छापनी शुरू कर दीं। इन किताबों में चित्रों का उपयोग किया गया। कुछ किताबें ग्रामीण सभाओं एवं शहरी शराबघरों में सुनाई जाती थीं।

धार्मिक विवाद एवं प्रिंट का डर:- छापेखाने के द्वारा विचारों के प्रचार-प्रसार व बहस के द्वार खुले। सत्ता से नाराज लोगों ने अपने विचारों को छापकर फैलाना शुरू किया। लेकिन हर कोई इन मुद्रित किताबों से खुश नहीं था, क्योंकि अनेक लोगों को इन छपी हुई किताबों के शब्दों को लेकर यह आशंका थी कि न जाने आम लोगों पर इसका क्या असर होगा। यह डर था कि अगर छपे हुए एवं पढ़े जा रहे विवरण पर यदि नियंत्रण न होगा, तो लोगों में अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे। अगर ऐसा होता है, तो मूल्यवान साहित्य नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार धर्मगुरुओं, सम्राटों, लेखकों व कलाकारों के द्वारा व्यक्त की गई चिंता नए मुद्रित साहित्य की आलोचना बन गई।

​            धर्म सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवे (95) स्थापनाएँ (थिसिस) लिखीं, जिसकी एक प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाजे पर टांग दी गई। जिसके परिणामस्वरूप चर्च में विभाजन हो गया तथा प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार आरंभ हुआ। प्रिंट के प्रति लूथर ने कहा था— "मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है और सबसे बड़ा तोहफा है।"

मुद्रण और प्रतिरोध:- 16वीं सदी में इटली के किसान मेनोक्कियो ने किताबें पढ़ना शुरू किया एवं बाइबिल के नए अर्थ निकाले। उसने ईश्वर एवं सृष्टि के बारे में ऐसे विचार बनाए कि रोमन कैथोलिक चर्च उससे नाराज हो गया तथा चर्च ने ऐसे धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए 'इन्क्वीजीशन' (धर्मअदालत) शुरू किया। मेनोक्कियो को पकड़कर मौत की सजा दे दी गई तथा प्रकाशकों एवं पुस्तक विक्रेताओं पर प्रतिबंध लगाए गए तथा 1558 से प्रतिबंधित किताबों की सूची बनाना शुरू कर दिया।

पड़ने का जुनून:- 17वीं-18वीं सदी में यूरोप के अधिकांश भागों में साक्षरता बढ़ी। 18वीं सदी के अंत तक यूरोप के अधिकांश भागों में 60 से 80% तक साक्षरता बढ़ गई। इस समय लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हुआ, अतः किताबें और अधिक छपने लगीं। पुस्तक विक्रेताओं ने गाँव-गाँव जाकर किताबें बेचने वाले (फेरीवालों) को काम पर लगाया। ये किताबें मुख्यतः पंचांग के अलावा लोकगाथाएँ व लोकगीतों की हुआ करती थीं। इंग्लैंड में 'पेनी चैपबुक्स' (एकपैसिया किताबें) बेचने वाले को 'चैपमैन' कहा जाता था। फ्रांस में 'बिब्लियोथेक ब्लीयू' का चलन था, यह सस्ते कागज पर छपी हुई और नीली जिल्द में बंधी छोटी किताबें होती थीं। इसके अलावा चार-पाँच पन्ने की प्रेम कहानियाँ होती थीं। अतीत की गाथाओं को इतिहास कहा जाता था।

​          18वीं सदी के आरंभ में पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ। सामाजिक घटनाओं के साथ मनोरंजन, युद्ध एवं व्यापार से जुड़ी जानकारियों के साथ विदेशों की खबरें भी छपने लगीं। प्राचीन एवं मध्यकालीन ग्रंथ संकलित किए गए तथा नक्शों के साथ वैज्ञानिक खोजें भी छापी गईं। अतः विज्ञान एवं तर्क से जुड़े हुए विचार भी साहित्य के साथ छापे जाने लगे।

दुनिया के जालिमों अब हिलोगे तुम:- 18वीं सदी के मध्य तक लोगों को यह विश्वास हो गया कि किताबों से ही विकास एवं ज्ञान का उदय होता है। लोगों का मानना था कि किताबें दुनिया बदल सकती हैं। वे निरंकुशवाद एवं आंतकी सत्ता से मुक्ति दिलाकर विवेक-बुद्धि का शासन लाएँगी। उपन्यासकार लुई सेबस्तिएँ मर्सिए ने घोषणा की: "छापेखाना प्रगति का सबसे ताकतवर औजार है, इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।" मर्सिए की किताबों में नायक किताबें पढ़ा करते थे एवं किताबों की दुनिया में जीते थे। मर्सिए ने छापेखाने की भूमिका एवं निरंकुशवाद के बारे में लिखा था— "हे निरंकुशवादी शासकों! अब तुम्हारे काँपने का समय आ गया है। आभासी लेखक की कलम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे।"

मुद्रण संस्कृति एवं फ्रांसीसी क्रांति:- इतिहासकारों के अनुसार फ्रांसीसी क्रांति के लिए मुद्रण संस्कृति ने अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं, जिन्हें निम्न तर्कों के द्वारा समझा जा सकता है:

छपाई के कारण ज्ञानोदय के चिंतकों के विचारों का प्रसार हुआ। इन्होंने परंपरा, अंधविश्वास एवं निरंकुशवाद की आलोचना की तथा रीति-रिवाज के स्थान पर विवेक के शासन पर बल दिया। वॉल्तेयर एवं रूसो के लेखन का व्यापक पाठक वर्ग था, अतः पाठक तार्किक नजरिए से दुनिया को देखने लगे थे।

​छपाई ने वाद-विवाद की संस्कृति को जन्म दिया तथा प्राचीन मूल्यों, संस्थाओं एवं नियमों पर जनता के बीच बहस शुरू हुई। नई पब्लिक ने धर्म एवं आस्था पर सवाल उठाए, अतः लोगों में सामाजिक क्रांति के नए विचारों का सूत्रपात हुआ।

​1780 के दशक तक राजशाही एवं उनकी नैतिकता का मजाक उड़ाने वाला साहित्य छपने लगा, जिससे सामाजिक व्यवस्था पर अनेक सवाल उठने लगे। कार्टून एवं कैरिकेचरों में यह भाव दिखाई देता था कि जनता मुश्किलों में फंसी है, जबकि राजशाही भोग-विलास में डूबी हुई है। अतः इस साहित्य ने लोगों को राजतंत्र के खिलाफ और अधिक भड़काया।

बच्चे, महिलाएँ और मजदूर:- प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने के कारण बच्चे पाठकों की एक महत्वपूर्ण श्रेणी बन गए। फ्रांस में 1857 में बाल पुस्तकें छापने के लिए एक प्रेस की स्थापना की गई, जिसमें परिकथाओं एवं लोककथाओं का प्रकाशन किया गया। जर्मनी में भी ग्रिम बंधुओं (Grimm Brothers) के द्वारा एकत्रित लोककथाओं का संग्रह प्रकाशित हुआ। इस समय महिलाओं ने भी पाठक एवं लेखिका की भूमिका निभाई। पेनी मैगजींस (एकपैसिया पत्रिकाएँ) महिलाओं के लिए छापी जाती थीं। 19वीं सदी में महिलाएँ उपन्यास की मुख्य पाठक बनीं। जेन ऑस्टेन, ब्रॉन्टे बहनें, जॉर्ज इलियट आदि महिलाओं ने उपन्यास लिखना शुरू किया।

​17वीं सदी से ही किराये पर किताब देने वाले पुस्तकालय (लेंडिंग लाइब्रेरी) अस्तित्व में आए। 19वीं सदी में इंग्लैंड में ऐसे पुस्तकालयों का उपयोग व्हाइट-कॉलर मजदूरों, कारीगरों एवं निम्नवर्गीय लोगों को शिक्षित करने के लिए किया गया।

​नए तकनीकी परिष्कार:- 18वीं सदी के अंत तक प्रेस धातु से बनने लगी। 19वीं सदी में छापेखाने में सुधार हुआ तथा न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने शक्ति-चालित बेलनाकार (सिलिंड्रिकल) प्रेस का आविष्कार किया, जिससे प्रति घंटे 8000 शीटें छापी जा सकती थीं।

​19वीं सदी के अंत तक ऑफसेट प्रेस का विकास हुआ, जिसके द्वारा एक साथ 6 रंगों में छपाई की जाने लगी। इस समय कागज डालने की विधि में सुधार हुआ एवं स्वचालित रोलर तथा रंगों के लिए फोटो-विद्युत नियंत्रण काम में आने लगे।

​19वीं सदी में पत्रिकाओं में उपन्यासों को धारावाहिक के रूप में छापा जाने लगा, जिससे इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें और अधिक सस्ती हो गईं। 1930 की आर्थिक मंदी के कारण प्रकाशकों को किताबों की बिक्री कम होने का डर था, अतः उन्होंने सस्ते पेपरबैक संस्करण छापना शुरू कर दिया।

​भारत का मुद्रण संसार

​मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियाँ:- भारत में अरबी, फारसी, संस्कृत आदि भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों की पुरानी परंपरा थी। ये पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों पर या हाथ से बने कागज पर नकल करके बनाई जाती थीं। कभी-कभी इन पर तस्वीरें भी बनाई जाती थीं। लेकिन पांडुलिपियाँ नाजुक होती थीं एवं महंगी होती थीं, अतः इन्हें पढ़ना व संभालकर रखना आसान नहीं था। इसलिए इनका दैनिक उपयोग नहीं होता था। इस समय बंगाल में ग्रामीण पाठशालाओं में भी गुरु याददाश्त से बच्चों को किताबें (पाठ) सुनाते थे।

​छपाई का भारत आना:- 16वीं सदी में पुर्तगाली धर्मप्रचारकों के साथ प्रिंटिंग प्रेस भारत आई। इस समय जेसुइट प्रचारकों ने कोंकणी भाषा सीखी एवं पुस्तकें छापना शुरू किया। 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ भाषा में लगभग 50 किताबें छापी गईं। कैथोलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब छापी तथा 1713 में मलयालम में पहली किताब छपी। डच धर्मप्रचारकों ने भी तमिल किताबें छापीं।

​        जेम्स ऑगस्टस हिकी ने 1780 से 'बंगाल गजट' नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका छापना शुरू किया तथा इसके लिए लिखा कि "यह हर किसी के लिए खुली एक व्यावसायिक पत्रिका है, जो किसी के प्रभाव में नहीं है।" हिकी को अपनी प्रेस की स्वतंत्रता पर अभिमान था। उसने दासों की बिक्री से जुड़ी हुई खबरें छापना शुरू किया तथा अंग्रेज अधिकारियों से जुड़ी गपशप भी छापता था, जिससे नाराज होकर गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने हिकी पर मुकदमा दर्ज कर दिया। 18वीं सदी के अंत तक अनेक पत्र-पत्रिकाएँ छपने लगीं। भारतीय भी अखबार छापने लगे। इस समय राजा राममोहन राय के सहयोगी गंगाधर भट्टाचार्य ने भी 'बंगाल गजट' का प्रकाशन शुरू किया।

​धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें:- 19वीं सदी के आरंभ से ही अनेक धार्मिक समूह औपनिवेशिक समाज में होने वाले परिवर्तनों के साथ धर्म की अलग-अलग व्याख्या कर रहे थे। अनेक लोग रीति-रिवाजों की आलोचना करते हुए सुधार चाहते थे, जबकि कुछ लोग इन सुधारों के खिलाफ थे। यह वाद-विवाद प्रिंटिंग प्रेस के माध्यम से आम जनता के सामने आ रहा था। इस समय धर्मसुधारकों एवं रूढ़िवादियों के बीच विधवा विवाह, सती प्रथा, मूर्ति पूजा जैसे विषयों पर बहस शुरू हुई तथा अखबारों में विभिन्न तर्क छपने लगे।

​1821 ई. में राजा राममोहन राय ने 'संवाद कौमुदी' का प्रकाशन किया तथा रूढ़िवादियों ने इनके विचारों का खंडन करने के लिए 'समाचार चंद्रिका' का सहारा लिया। इसी समय दो फारसी भाषा के अखबार 'जाम-ए-जहाँ नामा' एवं 'शम्सुल अख़बार' 1822 में प्रकाशित हुए। ​उत्तरी भारत में मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर उलेमा चिंतित थे। इन्होंने अपनी चिंता से निपटने के लिए लिथोग्राफी प्रेस के माध्यम से धर्मग्रंथों के फारसी एवं उर्दू अनुवाद छापे। 1867 में देवबंद सेमिनरी ने मुसलमानों को इस्लामी नियम सिखाते हुए हजारों फतवे जारी किए। तुलसीदास की 16वीं सदी की किताब 'रामचरितमानस' का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कोलकाता से प्रकाशित हुआ। ​लखनऊ के नवल किशोर प्रेस एवं बम्बई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस के द्वारा भारतीय भाषाओं में धार्मिक किताबें छापी गईं। इस प्रकार मुद्रण ने समाज के बीच केवल मतभेद पैदा नहीं किए, बल्कि इसने समुदायों के विभिन्न हिस्सों को संपूर्ण भारत से जोड़ने का कार्य भी किया।

​प्रकाशन के नए रूप:- आरंभ में भारतीयों को भी यूरोपीय उपन्यास पढ़ने के लिए मिलते थे, लेकिन कुछ समय बाद भारतीय लेखकों का उदय हुआ, जिससे लेखन की नई विधाएँ सामने आईं। अब गीत, कहानियाँ तथा सामाजिक-राजनीतिक लेख पाठकों की दुनिया का हिस्सा बनने लगे। 19वीं सदी के अंत तक एक नई दृश्य-संस्कृति विकसित हुई। इस समय चित्रों की अनेक कॉपियाँ आसानी से बनाई जा सकीं। राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने अनेक तस्वीरें बनाईं। इन तस्वीरों ने धीरे-धीरे आधुनिक परंपरा, धर्म, राजनीति, समाज एवं संस्कृति के लोकप्रिय विचारों को विकसित किया। 1870 के दशक तक अखबारों में सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर कैरिकेचर व कार्टून छपने लगे।

​महिलाएँ एवं मुद्रण:- इस समय महिलाओं की जिंदगी एवं उनकी भावनाओं को साफगोई एवं गहनता के साथ लिखा जाने लगा। अनेक पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी तथा नारी शिक्षा पर बल दिया गया। लेकिन परंपरावादी हिंदू परिवारों का मानना था कि पढ़ी-लिखी लड़की विधवा हो जाती है, इसी तरह मुसलमानों को लगता था कि उर्दू के रूमानी अफसाने पढ़कर समाज की महिलाएँ बिगड़ जाएँगी।

​कभी-कभार महिलाएँ ऐसे विचारों का विरोध करती थीं। पूर्वी बंगाल में 19वीं सदी के आरंभ में एक रूढ़िवादी परिवार में ब्याही महिला रशसुन्दरी देवी ने रसोई में छुपकर पढ़ना सीखा। आगे चलकर रशसुन्दरी देवी ने 'आमार जीवन' नामक आत्मकथा लिखी, जो 1876 में प्रकाशित हुई। यह बंगाली भाषा में प्रकाशित प्रथम पूर्ण आत्मकथा थी। 1860 के दशक में कैलाशभाषिनी देवी ने महिलाओं पर लिखना शुरू किया। उन्होंने महिलाओं के अनुभवों जैसे—घर में बंदी रहना, अनपढ़ रखना, घर के काम का बोझ, परिवार के द्वारा तिरस्कार आदि पर लिखना शुरू किया।

       ​1880 के दशक में ताराबाई शिंदे एवं पंडिता रमाबाई ने उच्च जाति की महिलाओं के दयनीय जीवन पर लिखना शुरू किया। एक तमिल उपन्यास में एक महिला ने लिखा था— "बहुत तेरे कारणों से मेरी दुनिया छोटी है... मेरे जीवन की आधी खुशियाँ किताबें पढ़ने से आईं।" तमिल, बंगाली एवं उर्दू में प्रिंट संस्कृति पहले ही विकसित हो चुकी थी, जबकि 1870 के दशक से हिंदी में भी छपाई शुरू हुई।

​20वीं सदी के आरंभ में महिलाओं के लिए मुद्रित एवं उनके द्वारा संपादित पत्रिकाएँ लोकप्रिय हो गईं। इनमें महिलाओं की शिक्षा, विधवा विवाह, विधवा जीवन, राष्ट्रीय आंदोलन जैसे मामलों पर लिखना शुरू हुआ। राम चड्ढा ने महिलाओं को आज्ञाकारी पत्नी बनने की सीख देने के उद्देश्य से 'इस्त्री धर्म विचार' पुस्तक लिखी। खालसा ट्रैक्ट सोसायटी ने भी इसी तरह की सस्ती पुस्तकें छापना शुरू किया। बंगाल में केंद्रीय कोलकाता का एक पूरा इलाका (बटतला) लोकप्रिय किताबों के प्रकाशन के लिए प्रसिद्ध हुआ।

​प्रिंट और गरीब जनता:- 19वीं सदी में मद्रास में कम कीमत पर छोटी किताबें बेची गईं, अतः गरीब लोगों ने भी किताबें खरीदना शुरू किया। 20वीं सदी के आरंभ में सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे। अमीरों के लिए पुस्तकालय खोलना प्रतिष्ठा की बात थी। 19वीं सदी के अंत में जातिगत भेदभाव पर अनेक किताबें छापी गईं।

       ​निम्न जातीय आंदोलनों के मराठी प्रणेता ज्योतिराव फुले ने अपनी 'गुलामगीरी' नामक पुस्तक (1871) में जाति प्रथा के अत्याचारों के बारे में लिखा। महाराष्ट्र में डॉ. भीमराव आंबेडकर एवं मद्रास में ई.वी. रामासामी नायकर (पेरियार) ने जाति आधारित भेदभाव पर लिखना शुरू किया। कानपुर के मिल मजदूर काशीबाबा ने 1938 में 'छोटे और बड़े का सवाल' लिखकर जाति एवं वर्गीय शोषण पर अनेक सवाल उठाने शुरू किए। 1935 से 1955 के बीच एक और मिल मजदूर ने 'सुदर्शन चक्र' के उपनाम से 'सच्ची कविताएँ' नामक ग्रंथ छापना शुरू किया। अनेक समाज सुधारकों ने यह कोशिश की थी कि मजदूरों के बीच नशाखोरी कम हो, साक्षरता बढ़े एवं राष्ट्रभक्ति की भावना जागे।

​प्रिंट और प्रतिबंध:- ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा 1798 से पहले मुद्रण पर विशेष प्रतिबंध नहीं लगाया गया था, लेकिन कुछ समय बाद सेंसरशिप (पाबंदी) लगाना शुरू किया, क्योंकि कंपनी को इस बात की चिंता थी कि इन आलोचनाओं का लाभ उठाकर कंपनी के आलोचक इंग्लैंड में कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार के खिलाफ माहौल न बना दें। कोलकाता सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 1823 में प्रेस की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए कुछ कानून बनाए गए। इस समय कंपनी ने ब्रिटिश शासन का प्रोत्साहन देने वाले अखबारों का समर्थन किया।

​1835 में गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंक प्रेस कानूनों की पुनर्समीक्षा के लिए तैयार हुआ तथा थॉमस मैकाले ने पुनः प्रेस को स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए नए नियम बनाए। लेकिन 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने भारतीय भाषाओं से संबंधित प्रेस को बंद करने की माँग की।

​आयरिश प्रेस कानून (Irish Press Laws) के आधार पर 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (Vernacular Press Act) पारित किया गया, जिसके तहत प्रेस में रिपोर्ट एवं संपादकीय को सेंसर करने का अधिकार सरकार को मिल गया। अगर सरकार के द्वारा किसी रिपोर्ट को छापने से मना कर दिया जाता और अखबार को पहले चेतावनी दी जाती; अगर चेतावनी को न माना जाए, तो अखबार जब्त कर लिए जाते थे और मशीनें छीन ली जाती थीं। राष्ट्रवादी आलोचनाओं को पूर्णतः दबाने के बावजूद भी लोगों ने गुप्त तरीके से छापना जारी रखा। जब पंजाब के क्रांतिकारियों को काला पानी की सजा दी गई, तो बाल गंगाधर तिलक ने अपने अखबार 'केसरी' में इसकी कटु आलोचना की, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें भी 1908 में बंदी बना लिया गया।

महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्द (शब्दावली)

​खुशनवीसी (कैलीग्राफी): सुलेखन की कला, अर्थात हाथ से बहुत सुंदर और कलात्मक ढंग से लिखने का कार्य करने वाले।

​वेलम: जानवरों के चमड़े (चर्मपत्र) से बनी लेखन की सतह।

कंपोजिटर: छपाई के लिए टेक्स्ट/टाइप को व्यवस्थित कर डिजाइन तैयार करने वाला व्यक्ति।

​गेली (Galley): धातु का वह फ्रेम जिसमें टाइप बिछाकर डिजाइन या इबारत तैयार की जाती है।

​प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार: 16वीं सदी में यूरोप में रोमन कैथोलिक चर्च में सुधार के लिए चलाया गया एक आंदोलन, जिसे प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार के नाम से जाना गया।

​इन्क्वीजीशन (धर्मअदालत): विधर्मियों (चर्च विरोधी विचार रखने वालों) की पहचान करने तथा उन्हें दण्ड देने वाली रोमन कैथोलिक संस्था।

​संप्रदाय: किसी मुख्य धर्म का एक उप-समूह या पंथ।

​पंचांग: चंद्रमा, सूर्य, ज्वार-भाटा एवं अन्य ग्रहों की गति से संबंधित लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी जानकारियों का वार्षिक प्रकाशन।

चैपबुक (Pocket Book): पॉकेट बुक के आकार की छोटी और सस्ती किताबों को चैपबुक कहा जाता था।

Comments