अध्याय: उपभोक्ता अधिकार
उपभोक्ता
किसी वस्तु को खरीदने एवं उपयोग में लेने वाले व्यक्ति को उपभोक्ता कहते हैं। वस्तु एवं सेवाओं का उपयोग करना उपभोग कहलाता है।
उपभोक्ता आंदोलन के शुरुआत के कारण:
- उपभोक्ताओं का असंतोष
- कालाबाज़ारी
- जमाखोरी
- खाद्यान्न पदार्थों की कमी
- खाद्यान्न पदार्थों में मिलावट
- उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई नियम नहीं थे।
इन सभी कारणों से 1960 में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत हुई। अतः 1970 के दशक में उपभोक्ता संस्थाएँ अधिकारों से संबंधित आलेखों के लेखन एवं प्रदर्शनी का कार्य करने लगीं।
भारत सरकार द्वारा 24 दिसंबर 1986 को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया गया, जिसे कोपरा (COPRA 1986) के नाम से जाना जाता है।
उपभोक्ता शोषण
वह क्रिया या व्यवहार जिसके माध्यम से उत्पादक या विक्रेता किसी उपभोक्ता से वस्तु या सेवा की अधिक कीमत लेना, निम्न श्रेणी की वस्तु प्रदान करना या धोखा देना, उपभोक्ता शोषण कहलाता है।
उपभोक्ता शोषण के प्रमुख कारण:
- सीमित सूचना
- सीमित आपूर्ति
- सीमित प्रतिस्पर्धा
- साक्षरता कम होना
उपभोक्ताओं को विभिन्न कारणों से शोषित किया जाता है, जो कि निम्न हैं:
- उपभोक्ताओं को विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के बारे में जानकारी न हो तो वे आसानी से उत्पादक या विक्रेता के जाल में फँस जाते हैं।
- बाजार में प्रतिदिन नई वस्तुएँ आती रहती हैं तथा अनेक कंपनियों के नाम से एक ही वस्तु बेची जाती है। अतः उपभोक्ता के लिए यह जानना कठिन हो जाता है कि कौन सी वस्तु असली व अच्छी है तथा कौन सी वस्तु नकली व घटिया है।
- अनेक बार बाजार में वस्तु की मांग बढ़ जाती है, जबकि वस्तु की आपूर्ति कम होती है। ऐसी स्थिति में उत्पादक एवं विक्रेता उपभोक्ता से अधिक कीमत वसूलते हैं, जिससे उपभोक्ता का शोषण होता है।
- अनेक कंपनियाँ टीवी (TV), रेडियो आदि पर अपने सामान का ऐसा आकर्षक विज्ञापन करती हैं जो वास्तव में उस वस्तु में गुण नहीं होते हैं। इन आकर्षक विज्ञापनों के झांसे में आकर उपभोक्ता फँस जाते हैं।
- साक्षरता कम होना भी उपभोक्ता के शोषण का कारण है, क्योंकि उत्पादक या विक्रेता अशिक्षित उपभोक्ताओं को आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।
उपभोक्ता के अधिकार
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986) के द्वारा सरकार ने उपभोक्ता को कुछ अधिकार प्रदान किए हैं, जो निम्न हैं:
- सुरक्षा का अधिकार: उपभोक्ता को यह अधिकार है कि वह ऐसी सभी वस्तुओं की बिक्री से अपना बचाव कर सकता है जो उसके जीवन या संपत्ति के लिए हानिकारक हों।
- सूचना का अधिकार: उपभोक्ता को यह अधिकार है कि वह प्रत्येक खरीदी जाने वाली वस्तु की गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता, मूल्य आदि की सूचना प्राप्त कर सके ताकि उसका शोषण न हो।
- चयन करने का अधिकार: प्रत्येक उपभोक्ता को यह अधिकार है कि वह विभिन्न प्रकार की वस्तुओं में से अपनी पसंद के अनुसार वस्तुओं को चुन सकता है।
- सुनवाई का अधिकार: प्रत्येक उपभोक्ता को यह अधिकार है कि वह उपभोक्ता से जुड़े संगठनों/संस्थाओं के सामने अपनी बात रखे। उपभोक्ता संगठन उन्हें आश्वासन देते हैं कि उनकी समस्याओं पर पूरा ध्यान दिया जाएगा।
- शिकायत/क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार: प्रत्येक उपभोक्ता को यह अधिकार है कि जब कोई गलत व्यापारिक कार्यप्रणाली के विरुद्ध शिकायत करता है, तो उसका सही तरीके से निपटारा किया जाए।
उपभोक्ता के कर्तव्य
- किसी भी वस्तु को खरीदते समय उसकी गुणवत्ता को अच्छे से देख ले तथा जहाँ तक संभव हो, गारंटी कार्ड/वारंटी कार्ड आवश्यक रूप से ले।
- खरीदे गए सामान का पक्का बिल/रसीद आवश्यक रूप से ले।
- अपनी वास्तविक समस्या की शिकायत अवश्य दर्ज कराए।
- सामान अधिकृत दुकान से ही खरीदे एवं ISI / एगमार्क (Agmark) वाली वस्तुएँ ही खरीदे।
- अपने अधिकारों की जानकारी रखे तथा आवश्यकता पड़ने पर उन अधिकारों का उपयोग भी करे।
उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया की सीमाएँ
- उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया जटिल, खर्चीली और अधिक समय लगने वाली होती है।
- कई बार उपभोक्ता को वकीलों का सहारा लेना पड़ता है। ये मुकदमे अदालती कार्यवाही में शामिल होने एवं आगे बढ़ने में अधिक समय लेते हैं।
- अधिकांश उपभोक्ताओं को खरीदी गई वस्तु का बिल नहीं दिया जाता है, इसलिए ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना कठिन होता है।
- बाजार में अधिकांश वस्तुएँ फुटकर व्यापारियों से खरीदी जाती हैं।
- श्रमिकों के हित की रक्षा के लिए बनाए गए कानून असंगठित क्षेत्रों में लागू न हो पाने के कारण बाजार में कार्य करने के नियमों की पालना नहीं हो पाती।
उपभोक्ता की एकजुटता का प्रदर्शन
- उपभोक्ता संगठन (उपभोक्ता संरक्षण समिति) का निर्माण करना।
- उपभोक्ता आंदोलन में शिकायत दर्ज करवाना।
- उपभोक्ता के साथ धोखाधड़ी करने वालों के विरुद्ध आवाज उठाना।
- बेईमान उत्पादक या विक्रेता के विरुद्ध प्रदर्शन करना।
उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता
- उपभोक्ता को उसके अधिकार व कर्तव्य की जानकारी देने के लिए।
- उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने के लिए।
- वस्तु के मूल्य पर नियंत्रण करने के लिए।
- जमाखोरी या कालाबाज़ारी को रोकने के लिए।
- उत्पादक या विक्रेता द्वारा की जाने वाली मिलावट को रोकने के लिए।
- गुणवत्ता युक्त वस्तु के उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए।
उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम 1986 (COPRA - कोपरा)
- यह अधिनियम 24 दिसंबर 1986 को लागू हुआ, अतः 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- इस अधिनियम को COPRA (कोपरा) के नाम से जाना जाता है।
- इस अधिनियम का निर्माण उपभोक्ता के हितों की रक्षा तथा झगड़ों के निपटान के लिए किया गया।
- इस अधिनियम की एक मुख्य धारा के तहत राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला स्तर पर उपभोक्ता न्यायालय/अदालत की स्थापना की गई है।
उपभोक्ता न्यायसभा (अदालत) के प्रकार / वर्गीकरण
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राष्ट्रीय स्तर:
- राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित उपभोक्ता न्यायालय को राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग कहा जाता है।
- इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थित है।
- इस न्यायालय के द्वारा ₹1 करोड़ से अधिक राशि वाले मुकदमों का निपटान किया जाता है।
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राज्य स्तर:
- राज्य स्तर पर स्थापित न्यायालयों को राज्य उपभोक्ता आयोग/न्यायालय कहा जाता है।
- इन न्यायालयों में ₹20 लाख से ₹1 करोड़ तक की राशि के मुकदमों की सुनवाई की जाती है।
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जिला स्तर:
- जिला स्तर के इन न्यायालयों को जिला उपभोक्ता मंच कहा जाता है।
- इनमें ₹20 लाख तक की राशि के मुकदमों की सुनवाई की जाती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI - Right to Information)
- भारत सरकार ने अक्टूबर 2005 में सूचना पाने का अधिकार लागू किया, जिसे RTI के नाम से जाना जाता है।
- इसके अनुसार, उपभोक्ता जिन वस्तुओं या सेवाओं को खरीदता है, उसे उस वस्तु की सूचना पाने का अधिकार है।
- इस अधिनियम के तहत उपभोक्ता को शोषण के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का भी अधिकार प्राप्त है।
- इसी अधिनियम के तहत उपभोक्ता के संरक्षण हेतु उपभोक्ता अदालत का गठन किया गया है। यह अदालतें मामलों के निपटान के साथ-साथ समय पर उपभोक्ता का मार्गदर्शन भी करती रहती हैं।
मानक चिह्न (Standards)
- ISI Mark: खाद्यान्न व औद्योगिक उत्पादों पर गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए।
- Hallmark: सोने-चांदी के आभूषणों की शुद्धता के लिए।
- Agmark: कृषि आधारित उत्पादों के लिए।
मानक वस्तुओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए 'भारतीय मानक ब्यूरो' द्वारा ये मानक निर्धारित किए जाते हैं। ISI या एगमार्क जारी करने वाली भारतीय संस्था को भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards - BIS) कहा जाता है।
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