अध्याय-IX : भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे व समस्याएँ
प्रदूषण को मुख्यतः 4 भागों में बाँटा गया है-
(i) जल प्रदूषण
(ii) वायु प्रदूषण
(iii) भू-प्रदूषण
(iv) ध्वनि प्रदूषण
1. जल प्रदूषण:
जल में अवांछित पदार्थों के मिलने से जल की गुणवत्ता में होने वाले परिवर्तन को जल प्रदूषण कहा जाता है। अर्थात जल का दूषित होना ही जल प्रदूषण है। प्रदूषित जल में स्वतः शुद्धिकरण की क्षमता जल को शुद्ध नहीं कर पाती है, जो कि चिंता का विषय है। मानव उद्योग व कृषि जैसी अनेक क्रियाओं से जल को दूषित करता है। औद्योगिक अपशिष्ट, जहरीली गैसें, रासायनिक अवशेष, धातु, धूल, धुआँ आदि जल को प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक अपशिष्टों के जल स्रोतों में विसर्जन के कारण भी जल व जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। चमड़ा उद्योग, कागज उद्योग, वस्त्र उद्योग व रसायन उद्योग जल को दूषित करते हैं। इसके अलावा कीटनाशक, यूरिया आदि के उपयोग से रसायन भूगर्भिक जल स्रोतों तक पहुँचकर आन्तरिक जल संसाधनों को भी दूषित करते हैं। दूषित जल के उपयोग से डायरिया, आंतों के कृमि, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। W.H.O. के अनुसार भारत में 1/4 बीमारियाँ दूषित जल के उपयोग के कारण होती हैं। गंगा नदी के घनी आबादी क्षेत्र से गुजरने के कारण गंगा में बढ़ता जल प्रदूषण एक चिंता का विषय है।
नमामि गंगे कार्यक्रम:
गंगा एक राष्ट्रीय महत्व वाली नदी है जिसमें प्रदूषण को नियंत्रित करने व मार्ग की सफाई के लिए यह कार्यक्रम चलाया गया। इसमें निम्न प्रावधान किये गये:
शहरों में सीवर ट्रीटमेंट की व्यवस्था करना।
औद्योगिक प्रवाह की निगरानी।
नदियों का विकास।
नदी किनारों पर वनीकरण व जैव विविधता में वृद्धि।
नदियों के तल की सफाई।
उत्तराखण्ड, UP, बिहार, झारखण्ड में गंगा ग्राम का विकास करना।
नदी में किसी भी प्रकार के पदार्थ न डालना।
2. वायु प्रदूषण:
वायु में धूल, धुआँ, गैसें, दुर्गंध, जलवाष्प आदि में वृद्धि का होना, जो मानव व जीवजन्तुओं के लिए हानिकारक हो, उसे वायु प्रदूषण कहा जाता है। जीवाश्म ईंधन का दहन, खनन व उद्योग वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। यह प्रक्रियाएँ वायु में सल्फर व नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, \text{CO}_2, कार्बन मोनोक्साइड, सीसा व एस्बेस्टोस को निर्मुक्त करते हैं।
वायु प्रदूषण के कारण श्वसन तंत्रिय, तंत्रिका तंत्रिय, रक्तचाप आदि बीमारियाँ होती हैं। नगरों में कोहरा को 'शहरी धूम्र कोहरा' कहा जाता है। वायु प्रदूषण के कारण अम्लीय वर्षा भी होती है।
3. ध्वनि प्रदूषण:
ध्वनि का मानव की सहन सीमा से अधिक व असहज होना ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। वर्तमान में यह एक गम्भीर समस्या है। ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत उद्योग, मशीनें, निर्माण कार्य, मोटर वाहन, वायुयान, सायरन, लाउडस्पीकर आदि प्रमुख हैं। ध्वनि को डेसीबल में मापा जाता है। ध्वनि प्रदूषण स्थान विशिष्ट होता है, इसकी तीव्रता दूरी के साथ कम होती जाती है।
नगरीय अपशिष्ट का निपटान:
नगरों में विभिन्न स्रोतों के द्वारा जनित अपशिष्टों (ठोस अपशिष्ट) के कारण पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है। ठोस अपशिष्ट में मुख्यतः जंग लगी पिन, टूटे कांच के सामान, प्लास्टिक के डिब्बे, पॉलिथिन, फ्लॉपी, C.D. आदि को शामिल किया जाता है।
इन अपशिष्टों का निपटान निम्न दो स्रोतों से होता है:
(i) घरेलू प्रतिष्ठानों से
(ii) व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से
घरेलू अपशिष्टों को सार्वजनिक भूमि पर या निजी ठेकेदारों के स्थलों पर डाला जाता है, जबकि व्यावसायिक अपशिष्टों का निपटान जन सुविधाओं के द्वारा निचली सतह की सार्वजनिक भूमि पर निस्तारित किया जाता है। ठोस अपशिष्ट से दुर्गंध, मक्खियों, चूहे से स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ते हैं, टायफाइड, डिप्थीरिया, हैजा आदि बीमारियाँ होती हैं।
भारत में नगरीय अपशिष्ट का निपटान एक गम्भीर समस्या है। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलूरु आदि महानगरों में ठोस अपशिष्ट को 90% एकत्रित करके निपटान किया जाता है। लेकिन अधिकांश शहरों में अपशिष्ट का 30% से 50% तक बिना एकत्र किये छोड़ दिया जाता है, जिससे अनेक बीमारियाँ फैलती हैं। इन अपशिष्टों को उपचारित करके इनसे कम्पोस्ट व ऊर्जा का उत्पादन किया जाना चाहिए।
ग्रामीण शहरी प्रवास:
अनेक कारणों से ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्र की ओर प्रवास होता है, जिनमें रोजगार के अवसर, उच्च शिक्षा व चिकित्सा, शहरों में मजदूरों की मांग आदि के कारण होता है। भारत में नगरीय जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है जिसका मुख्य कारण प्रवास है।
Note: विश्व की 47% जन० नगरीय है।
गंदी बस्तियों की समस्याएँ:
नगरीय व ग्रामीण बस्तियाँ अपने कार्यों में भिन्न होती हैं। यह बस्तियाँ विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक रूप में विकसित हुई हैं। भारत में 69% जन० ग्रामीण है जो प्राथमिक क्रियाओं में संलग्न है। नगरीय केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों के विपरीत संगठित इकाई है जो सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक रूप से अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक विविधता वाले हैं। यहाँ फार्म हाउस व उच्च आय वाली बस्तियाँ हैं जिनमें चौड़ी सड़कें, स्ट्रीट लाइट, पार्क, खेल मैदान, व सुविकसित नगरीय अवसंरचना है। जबकि दूसरी ओर झुग्गी-बस्तियों, गंदी बस्ती व पटरियों के किनारे बने ढांचे हैं जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों से प्रवासित लोग निवास करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कच्चे मकान, निम्न स्वास्थ्य सुविधा, खुली हवा का अभाव, पेयजल, प्रकाश आदि सुविधाओं का अभाव पाया जाता है। इनमें रहने वाले लोग कम वेतन में अधिक जोखिम भरे कार्य करते हैं। इन बस्तियों में गरीबी, शराब का सेवन, अपराध आदि सामाजिक अराजकता देखने को मिलती है।
स्वच्छ भारत मिशन: भारत सरकार ने इस मिशन की शुरूआत शहरी गन्दी बस्तियों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए शुरू किया गया। यह शहरों के नवीकरण की योजना है।
भू-निम्नीकरण:
कृषि योग्य भूमि की गुणवत्ता या उपज उपलब्धता में कमी आना भू-निम्नीकरण कहलाता है। भू-निम्नीकरण मृदा अपरदन, लवणता तथा भू-क्षारता के कारण होता है। अर्थात् मृदा की स्थाई या अस्थाई रूप से उत्पादकता में कमी आना ही भू-निम्नीकरण है। भू-निम्नीकरण प्राकृतिक व मानव जनित प्रक्रियाओं के द्वारा होता है।
भारतीय दूर संवेदन संस्थान ने व्यर्थ भूमि को दूर संवेदन तकनीक की सहायता से सीमांकित किया है तथा प्रक्रियाओं के आधार पर प्राकृतिक खड्ड, मरूस्थलीय व तटीय भूमि, बंजर भूमि, तीव्र ढाल वाली भूमि व हिमानी क्षेत्र में वर्गीकृत किया है। निम्नीकृत भूमि में लवणता, जलाक्रांतता, खनन, चारागाह क्षेत्र आदि को शामिल किया जाता है।
धारावी गंदी बस्ती (स्लम):
यह एशिया की विशालतम गन्दी बस्ती है। इसमें बसें व तिपहिया वाहनों का प्रवेश निषेध है। इससे एक 'नाइन्टी फुट' नामक रोड़ गुजरती है जिसकी चौड़ाई आधे से भी कम है। इसकी गलियों से साइकिल का गुजरना भी मुश्किल है। यहाँ दो या तीन मंजिले भवन हैं जिनपर जंग लगी लोहे की सीढ़ियाँ हैं। यहाँ एक कमरे में 10 से 12 लोग रहते हैं। यहाँ पर छायारहित स्थान, वृक्ष रहित क्षेत्र, असं गृहीत कचरा, गंदे पानी के गड्ढे, कौओं-भूरे चूहे देखने को मिलते हैं। यहाँ पर मृत्तिका शिल्प (सिरेमिक्स), मिट्टी के बर्तन, कशीदाकारी, जरी का काम, उच्च फैशन वस्त्र, धातु कार्य आदि का कार्य किया जाता है।
Comments
Post a Comment